| Wednesday, 13 February 2013 12:09 |
शंभुनाथ दलितों, स्त्रियों, जनजातियों, किसानों के दमन और उनके उत्पीड़न के सवालों को उठाना एक बात है, और इनकी समस्याओं को एकदम अलगाव में देखना दूसरी बात। राष्ट्रीयता के पूंजीवादी और सामंतवादी दोषों की वजह से सबाल्टर्नवादी लेखक समूची 'राष्ट्रीयता' को ही ध्वस्त कर ]यह कम विडंबना नहीं है कि अमेरिका की हॉलीवुड जैसी जगहों से ऐसी संस्कृति आती है जो देश में फास्ट फूड-पेय, नाचने-गाने और उपभोग में 'एकरूपता' ला रही है। वहां के बौद्धिक-शैक्षिक केंद्रों से ऐसा सिद्धांत आता है जो उपर्युक्त सांस्कृतिक एकरूपता के समांतर 'सामाजिक भिन्नता' को बढ़ावा दे रहा है। भारत के बुद्धिजीवी उसका अंधानुकरण करते हैं। पश्चिम फिर बता रहा है कि हम क्या हैं। वह स्वतंत्रता के सब्जबाग दिखाता है और 'सामुदायिक शत्रुता का दर्शन' देता है, जिसे समाज वैज्ञानिक बुद्धिजीवी विद्वत्ता कहता है। सबाल्टर्नवादी समाज विज्ञानीया रुश्दी समर्थक अंग्रेजी लेखक कभी प्रत्यक्ष विदेशी पंूजी निवेश का विरोध नहीं करेंगे। वे हिंसक अमेरिकी जीवन-ढंग पर नहीं बोलेंगे, दुनिया के एक सौ पचास से अधिक देशों में अमेरिकी फौज की उपस्थिति पर टिप्पणी नहीं करेंगे। साम्राज्यवाद और सांस्कृतिक उन्मूलन पर उनकी कलम नहीं चलेगी। वे 'मधुशाला' का पाठ करके काव्य-प्रेम दिखाने वाले अमिताभ बच्चन के नरेंद्र मोदी के ब्रांड एंबेसडर बन जाने पर चुप रहेंगे। वे संक्रामक वंशवाद और मनमोहन सिंह से सम्मोहित रहेंगे। महाराष्ट्र और असम में हिंदीभाषियों के विरुद्ध घृणा-प्रचार पर बिल्कुल नहीं बोलेंगे, क्योंकि वे 'भारतीय राष्ट्रीयता' की धारणा से ही प्रस्थान कर चुके हैं और दरअसल, यथास्थितिवादी वाग्विलासी हैं। ये आम आदमी की पहुंच के बाहर जा चुकी अच्छी शिक्षा और चिकित्सा के बारे में अनजान बने रहेंगे। ये अंबानी के तिरपन मंजिलों के मकान को अश्लील न कह कर दलितों से कहेंगे, तुम भी ऐसे मकान बना लो। सबाल्टर्नवादियों की कुछ अपनी चुप्पियां हैं, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल न करना इस स्वतंत्रता को किसी न किसी के हाथ बेच देना है। जयपुर साहित्य समारोह एक व्यावसायिक विनियोग का अवसर है। हर बार इसमें चुना जाता है कि विवाद की थीम क्या हो। आजकल विवाह-शादी में, सार्वजनिक पूजा या मॉल-मल्टीप्लेक्स के प्रचार के लिए सोचा जाता है कि केंद्रीय थीम क्या हो। ठेकेदार थीम के अनुसार पैसे लेकर सब तैयार कर देते हैं। अब साहित्यिक उत्सव भी 'विवाद की थीम' बना कर तैयार होते हैं। सिनेमा, टीवी, खेल की हस्तियों को बुला कर और बड़े-बड़े पुरस्कार देकर प्रचारित किए गए लेखकों को देश-विदेश से बुला कर भीड़ दिखाई जाती है, ताकि साहित्यिक उत्सव का आकर्षण बढ़े। कभी-कभी रुश्दी-नायपॉल, कभी आशीष नंदी, कभी किसी और लेखक से परिस्थिति बना कर साहित्यिक उत्सव में वितंडा खड़ा कराया जाता है। कभी मंत्री कूदते हैं। कोर्ट-कचहरी भी हो जाती है। इससे उत्सव उछलता है, पूंजी भी उछलती है, लेखक भी उछलता है और बाजार भी उठता है। उछलता जो हो, गिरता साहित्य है। ज्ञान और विशेषज्ञता हमेशा आदर की चीज हैं। फिर भी, प्राचीन काल में सत्ता के स्वार्थ में शास्त्र के दुरुपयोग हुए हैं, उसी तरह आज भी यथास्थितिवाद के लिए सामाजिक विभाजन के उद््देश्य से ज्ञान और विशेषज्ञता के दुरुपयोग हो रहे हैं। आशीष नंदी का जाति या किसी भी खंडित सामुदायिक कोण से समस्याओं को देखना ऐसा ही एक दुरुपयोग है। हर बार ऐसा होता है कि जयपुर साहित्य समारोह के बौद्धिक पहाड़ से बस ऐसा ही कोई मरा चूहा निकलता है। कहीं यह समारोह का खोखलापन तो नहीं है? दुनिया भर के सैकड़ों लेखक, इतना बड़ा जमावड़ा, करोड़ों का खर्च, दुर्लभ वैश्विक दृश्य, उपन्यास ही उपन्यास और इतने तामझाम से बार-बार निकले सिर्फ नकली विवाद, नकली प्रश्न या मिथ्या चेतना। हमेशा एक शब्द और एक लाठी साथ निकलें। देश में असहिष्णुता कौन बढ़ा रहा है? आप खुद समावेशी राष्ट्रीयता को सह नहीं पा रहे हैं, संविधान के निर्देशक सिद्धांतों को तोड़ रहे हैंं और जनता को नई-नई मिथ्या चेतनाओं और वंचनाओं के बीच निस्सहाय छोड़ रहे हैं और कहते हैं कि जनता असहिष्णु हो गई है, गुस्सैल हो गई है। बुद्धिजीवियों के चेहरे से गुस्सा गायब होगा और चिकनाई आएगी तो जनता का असंतोष निर्बुद्धिपरक रास्तों से फूटेगा। जब लेखक और समाज विज्ञानी अतार्किक होंगे तो क्या जनता कभी तार्किक होगी? साहित्य और समाज विज्ञान के पीछे से अगर अमेरिका अपना खेल खेलेगा और जयपुर साहित्य समारोह अंग्रेजी वर्चस्व वाला समारोह बन जाएगा तो वहां से सांस्कृतिक प्लेग के चूहे निकलेंगे। सांस्कृतिक महामारी के चूहे सिर्फ इसलिए बढ़ रहे हैं कि हिंदी लेखकों और प्रकाशकों में आत्मविश्वास की कमी है, एकजुटता की कमी है। वे भी दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में भारतीय भाषाओं के लेखकों का मेला आयोजित कर सकते हैं। जयपुर साहित्य समारोह के राष्ट्रीय जवाब की जरूरत है, जहां विवाद हो तो सही प्रश्न भी उठें। |
Thursday, February 14, 2013
विदेशी पूंजी और साहित्यिक खेल
विदेशी पूंजी और साहित्यिक खेल
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