| Sunday, 19 February 2012 12:03 |
रायबरेली और अमेठी जैसे अति-वीवीआईपी चुनाव क्षेत्रों में इतनी गरीबी क्यों है? यह रहस्य है मेरे लिए। इसका जवाब ढूंढ़ने पर नहीं मिलता। इन दोनों चुनाव क्षेत्रों के दायरे में फिर भी उन गांवों में, जिनको आंबेडकर गांव घोषित कर दिया गया है, परिवर्तन दिखता है। मायावती की आंबेडकर गांव योजना के तहत जिन गांवों में दलितों की आबादी पचहत्तर फीसद से अधिक है वहां प्रावधान है बिजली, पानी, सड़क और पक्के मकान (कॉलोनी) का। इन गांवों में मायावती का जिक्र बड़े प्यार से होता है। और लखनऊ शहर में मायावती आवास योजना के तहत झुग्गियों में रहने वालों को पक्के 'अपार्टमेंट' मिले हैं, वहीं जहां उनकी झुग्गियां होती थीं। लखनऊ के निवासी वैसे भी मुख्यमंत्री से इसलिए खुश हैं कि इस शहर को मायावती के दलित स्मारकों ने चमका दिया है। कुछ लोगों को शिकायत जरूर थी कि इन स्मारकों पर जरूरत से ज्यादा पैसा बरबाद किया गया है, लेकिन यह भी मानते हैं कि लखनऊ की पुरानी खूबसूरती वापस लौट रही है। इस शहर को मैं बचपन से जानती हूं, क्योंकि मेरी पढ़ाई उत्तर प्रदेश में हुई थी, सो मुझे याद है कि लखनऊ किसी जमाने में भारत के सबसे सुंदर शहरों में होता था। फिर आया समाजवाद का जमाना और लखनऊ में सिर्फ बने कई सारे बदसूरत सरकारी दफ्तर और सरकारी अफसरों के घर। नवाबों के बनाए गए इस शहर की खूबसूरती छिप गई इन बदसूरत इमारतों के पीछे। कितने मजे की बात है कि गरीब, दलित परिवार की एक महिला मुख्यमंत्री ने लखनऊ की पुरानी खूबसूरती लौटाने के लिए वह किया है, जो कभी नवाबों ने किया था। लखनऊ की नई इमारतों को देख कर, उसके पुराने बाजारों और इमामबाड़ों की सफाई देख कर उस पुराने शहर की यादें ताजा हुर्इं, जिसको मैंने बचपन में देखा था।
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Monday, February 20, 2012
कहीं चमक कहीं अंधेरा
कहीं चमक कहीं अंधेरा
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तवलीन सिंह
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