Sunday, February 23, 2014

बहसतलब ,हम गुलाम प्रजाजन स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक कब बनेंगे?कृपया खुलकर लिखें।

बहसतलब ,हम गुलाम प्रजाजन स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक कब बनेंगे?कृपया खुलकर लिखें।


पलाश विश्वास


बहसतलब ,हम गुलाम प्रजाजन स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक कब बनेंगे?कृपया खुलकर लिखें।

कवियों को हमने कविता में रायदेने की छूट दे रखी है और मानते भी हैं हम कि हर बंद दरवाजे पर दस्तक के लिए कविता से बेहतर कोई हाथ नहीं। हम यह बहस आपकी राय मिलने के बाद ही समेटेंगे।

बहस की पहली किश्त यह प्रस्तावना है।जिसे हम जारी कर रहे हैं।विषय विस्तार अगली किश्तों में होगा।


हमारे परम मित्र आदरणीय आनंद तेलतुंबड़े का मानना है कि अंबेडकरी विचारधारा का मूल एजंडा जाति उन्मूलन है।समयान्तर के ताजा अंक में उनका लेख छपा है इसके अलावा इस अंक के तमाम लेख जीति समस्या पर केंद्रित है।गिरिराजकिशोर जी संपादित अकार के ताजा अंक में पुनर्वास कालोनियों के बच्चो का आत्मकथ्य है।जो एकदम ताजा बयार जैसी है इस अनंत गैस चैंबर में।विचारधारा की नियति पर लंबा मेरा आलेख जो उन्होंने वर्षों से लटका रखी है,इस करतब से उसका हिसाब बराबर कर दिया है गिरराज किशोर जी और अकार टीम ने।इन बच्चों की जुबानी मैं खुद को अभिव्यक्त होता हुआ महसूस कर रहा हूं रिटायर दहलीज पर


अंबेडकरवादी विचारक तेलतुंबड़े की तर्ज पर हमारे गांधी वादी सामाजिक कार्यकर्ता ने भी लिखा है।वर्षों से सनी सोरी और दंडकारण्य के हक हकूक की लड़ाई लड़ रहे हिमांशु जी की मैं इसलिए भी तारीफ करता हूं कि सोनी सोरी के आप में शामिल होने के बावजूद उनकी वह आत्मीयता भंग नहीं हुई है।अब तक कारपोरेट राज और पूंजीबाद का सार्वाजनिक विरोद के जरिये वोटबैंक गणित ाधने वालों का पूंजीपरस्त आचरण हम देख चुके हैं।अगर केजरीवाल जुबानी तौर पर पूंजी वाद के हक में बात करें और जमीन पर कारपोरेट राज का विरोध,तो इसपर भी हमें पेट मरोड़ नहीं होना चाहिए।

हिमांशु जी ने लिखा हैः

जाति को तो मिटाना है भाई ,

याद रखना जातिवाद को मजबूत करने वाला कोई काम नहीं करना है .


जाति का विरोध करने वाले साथी जातिवादी घृणा फैलाने के आकर्षण में फंसने से बचें .


इसमें मज़ा तो बहुत आता है लेकिन इससे हमारी जाति के लोगों की स्तिथी में कोई सुधार नहीं आता .


मार्टिन लूथर किंग जब अश्वेतों की बराबरी की लड़ाई लड़ रहे थे तो उन्होंने श्वेतों के विरुद्ध घृणा का कोई भी वाक्य कभी नहीं बोला .


बल्कि उस लड़ाई में बहुत बड़ी संख्या में गोरे भी शामिल थे .


जब उनके एक साथी ने एक बार गलती से गोरी महिलाओं के विरुद्ध एक अपमानजनक गीत बनाया


तो मार्टिन लूथर किंग ने उसे रोक दिया था .

संचार क्रांति और तकनीक की वजह से अब मीडिया कारोबार कंडोम कवायद है। जिसमें जनप्रतिबद्धता,जनमत,विचारधारा,संवाद की कोई जगह नहीं है।भारतीय समाज में अखबार अब तक जनमत जनादेश निर्माण में अहम भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन अब वे अखबार रंग बिरंगे कंडोम सुगंधित हैंं।


जबकि भारतीय जनता कुल मिलाकर गुलामी की महाजनपद व्यवस्था है।हम सारे लोग प्रजाजन हैं।नागरिक बनने के लिए भी जाति उन्मूलनका एजंडा  प्रस्थानबिंदू बनना चाहिए।


इसी सिलसिले में राज्यसभा चैनल में श्याम बेनेगल के धारावाहिक संविधान देखना भी प्रासंगिक हो सकता है।

जनजागरण,सशक्ती करण,जन सुनवाई,जनहिस्सेदारी और वैचित्र के मध्यवैचित्र के सम्मान के साथ सामाजिक न्याय और समता आधारित समाज के निर्माण के लिए जाति उन्मूलन से बड़ा कोई एजंडा नहीं है।


हमारे युवा साम्यवादी साथियों ने दशकों के बाद इस दिशा में पहल की है।अभिनव सिन्हा सत्यनारायण ने भी अलग से बहस छेड़ी है।अनेक बिंदुओं पर असहमति के बावजूद हम उनकी इस पहल का तहेदिल स्वागत करते हैं।सहमति का विवेक और असहमति का साहस ही संवाद का आधार होना चाहिए।


बहसतलब इसबार यह है कि हम गुलाम प्रजाजन स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक कब बनेंगे।


आनंद तेलतुंबड़े ने अपने आलेख में बहुत साफ साफ लिखा हैः

पिछले छह दशक के दौरान हम जाति उन्मूलन के आंबेडकर के सपने को पूरा कर पाने में न सिर्फ नाकाम रहे हैं बल्कि उस सपने से हम कोसों दूर भी चले आए हैं। आंबेडकर के तथाकथित शिष्य ही इस सपने को दफनाने में सबसे आगे रहे हैं जिन्होंने अपनी-अपनी पहचान के झंडे उसकी कब्र पर गाढ़ दिए हैं। ऊंची जातियों को तो अपने जातिगत लाभ बचाए रखने में दिलचस्पी हो सकती है, लेकिन निचली जातियों को स्वेच्छा से अपनी कलंकित पहचानें ओढ़े रखने में क्या दिलचस्पी हो सकती है? जाति उन्मूलन की आंबेडकरवादी दृष्टि अकेले निचली जातियों की बेहतरी के लिए नहीं इस्तेमाल की जानी थी, बल्कि यह अनिवार्यतः समूची भारतीय जनता के लिए बनी थी। जाति महज भेदभाव या उत्पीड़न का मामला नहीं है। यह एक ऐसा वायरस है जो समूचे राष्ट्र को अपनी जकड़़ में बांधे हुए है। भारत की हर बुराई और लगातार उसके पिछड़ेपन के पीछे मुख्य कारक यही वायरस है। इसे एक क्रांति से रेचन करके ही शरीर से निकाला जा सकता है। कोई भी ऊपरी सुधार इस वायरस को नहीं हटा सकता बल्कि एक संपूर्ण लोकतांत्रिक क्रांति ही जमे हुए वर्गों को उनकी जगह से खत्म करेगी और भारत के समाजवादी भविष्य का रास्ता प्रशस्त करेगी। क्रांति समर्थक ताकतों को यह बात पूरी तरह अपने भीतर बैठा लेने की जरूरत है कि जब तक दलित उनके साथ नहीं आएंगे तब तक क्रांति का उनका सपना पूरा नहीं हो पाएगा। इसी तरह जाति विरोधी दलितों के लिए ध्यान देने वाली बात यह है कि जब तक उनके वर्ग के लोग उनकी ताकत नहीं बनाते, तब तक जाति उन्मूलन का सपना पूरा नहीं हो सकता। इससे यह बात निकलती है कि इन दोनों खेमों को अपनी ऐतिहासिक गलतियां और भूल दुरुस्त करने के लिए एक समान सरोकार के इर्द-गिर्द साथ आकर रणनीति बनानी होगी।


दलितों के लिए यह समझना रणनीतिक अपरिहार्यता है कि जाति सिर्फ सांस्कृतिक या धार्मिक मसला नहीं है बल्कि यह जीवन के हर पहलू के साथ गुंथी हुई है। अधिकतर दलित या तो खेत मजदूर के रूप में या फिर शहरी अनौपचारिक क्षेत्रों में कामगारों के रूप में मुश्किल से अपना पेट भर पा रहे हैं। उनका दलित होना उनकी आर्थिक स्थिति के साथ उलझा हुआ है। उनके ऊपर होने वाले उत्पीड़न से यह बात आसानी से समझी जा सकती है, जो उन्हें आतंकित कर घुटने टेक देने के लिए विवश करती है। कई मामलों में यह समर्पण दरअसल उच्च जातियों के वर्चस्व में आर्थिक और राजनीतिक लाभ को सुनिश्चित करता है, हालांकि वर्चस्व की ऐसी कार्रवाइयां उसी धर्म के लोगों द्वारा की जाती हैं जो दलित उत्पीड़ितों के वर्ग से ही आते हैं। ऐसे उत्पीड़न इसलिए संभव हो पाते हैं क्योंकि दलित वित्तीय रूप से कमजोर होते हैं, आर्थिक रूप से निर्भर, नैतिक रूप से खोखले और अपने वर्ग से असम्पृक्त होते हैं। इसीलिए आरक्षण की दवा उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए दी गई है ताकि अपनी आजीविका के साधनों पर उनका नियंत्रण हो सके और वे किसी भी तरह के अन्याय का प्रतिकार करने में नैतिक रूप से मजबूत बन सकें व उच्च जातियों के लोगों के साथ वर्गीय एकजुटता कायम कर सकें। इसका निदान व्यवहारिक तौर पर वही है जो बाबासाहब आंबेडकर ने 1936 में अपने प्रसिद्ध लेख ''मुक्ति कौन पथे'' में प्रस्तुत किया था जिसमें उन्होंने इस आंदोलन के लोगों के धर्मांतण का तर्क मुहैया कराया था। पहला कदम उन्हें जमीन दिलवाना, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलवाना और स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करवाना होगा; दूसरा, संघर्ष में आस्था की वैचरिकता बहाली का होगा और तीसरा, अन्य जातियों के साथ वर्गीय एकजुटता कायम करना होगा। कार्यक्रम के स्तर पर विचारधारात्मक तैयारी और वर्ग एकजुटता को पहले होना होगा ताकि सशक्तीकरण के साधनों के लिए संघर्ष को प्रभावी तौर से चलाया जा सके।



ऐसा वर्ग विरोधी और जाति विरोधी आंदोलनों को दोबारा गढ़ने से ही संभव होगा। एक तरफ दलित आंदोलन को जाति के मसलों पर संघर्ष करते हुए खुद को वर्ग की लाइन पर लाना होगा तो दूसरी ओर वाम आंदोलन को इस तरह से निर्देशित किया जाना होगा कि वह जाति के यथार्थ को पहचान सके और संघर्षरत दलितों के साथ एकजुटता कायम करने की जरूरत को महसूस कर सके। यह पहल हालांकि वाम आंदोलन की ओर से ही पूरे वैचारिक संकल्प के साथ की जानी होगी जो उसकी ओर से अब तक बकाया है तथा इस क्रम में खुद को सही मानने की अपनी प्रवृत्ति को उसे छोड़ना होगा। जैसा कि मैंने अपनी पुस्तक एंटी इम्पीरियलिज्म एंड एनिहिलेशन ऑफ कास्ट्स में लिखा था, एक बार इस प्रक्रिया की शुरुआत हो गई तो यह एक ऐसे सिलसिले में तब्दील हो जाएगी जिसका अंत बहुप्रतीक्षित भारतीय क्रांति में ही होगा। मुझे कोई और विकल्प नहीं दिखाई देता।


हम आनंद से सहमत हैं लेकिन इस बहस को जनसुनवाई में तब्दील करना चाहते हैं ताकि आतमघाती राजनीति और कंडोम मीडिया के घन घटाटोप में कोई रोशनी की किरण हमेारे लिए नई दिशा खोल सकें।


कृपया राय दर्ज करने से पहले आनंद का लिखा पढ़े जरुर।समयांतर का ताजा अंक नहीं मिला तो अभिषेक के जनपथ और मेरे ब्लागों में पूरा आलेख देख सकते हैं।

http://antahasthal.blogspot.in/2014/02/blog-post_16.html


हम फेस बुक वाल पर विश्वप्रसिद्ध कवि उदय प्रकाश की इस पोस्ट की तर्ज पर पहले ही उन सभी मित्रों से माफी मांगते हैं,जिनके मुखातिब हम हो नहीं पा रहे हैं,लाख कोशिशों के बावजूद,क्योंकि उनमें से ज्यादातर कंडोम से घिरे हुए हैं।

कुछ दोस्तों से न मिल पाने के लिए क्षमा मांगते हुए

February 23, 2014 at 3:42pm

आप बिल्कुल भी आहत न हों

क्योंकि बाहर निकलने के मामले में हमेशा से

काहिल और लद्धड़ रहा हूं. आपको तो मेरे बारे में यह खूब

पता ही है. अपनी गोदी में

मैं अपनी नन्हीं-सी बेटी को किसी कदर

संभाले हुए हूं. मेरे घुटनों पर चढ़ा हुआ है

मेरा प्यारा-सा छोटा बेटा, जिसने

बस अभी-अभी बोलना शुरू किया है

और बाकी के सारे के सारे

बेतहाशा बिना रुके बोले ही चले जा रहे हैं

वे मेरे कपड़ों को पकड़ कर झूल रहे हैं और मेरे हर कदम पर

मेरे साथ-साथ रेंगते हैं

मैं अपने घर के दरवाज़े के बाहर बहुत दूर तक

निकल ही नहीं पाऊंगा

मुझे डर है , सचमुच बहुत खेद है, मैं

आपके फाटक-दहलीज़ तक पहुंच ही नहीं पाऊंगा.

बिल्कुल बुरा न मानें. मुआफ़ी.

मेई-याओ चेन

(अनु : उदय प्रकाश / केनेथ रेक्सरोथ के अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर)


Saturday, February 22, 2014

दाम तो गैस के बढ़ेंगे ही,अब मिलेगी भी नहीं,रसोई का दूसरा इंताम जरुर कर लें।

दाम तो गैस के बढ़ेंगे ही,अब मिलेगी भी नहीं,रसोई का दूसरा इंताम जरुर कर लें।

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास


दाम तो गैस के बढ़ेंगे ही,अब मिलेगी भी नहीं,रसोई का दूसरा इंताम जरुर कर लें।25 परवरी को रसोई गैस हड़ताल का साझा आह्वान किया है आल इंडिया एलपीजी डिस्ट्रीब्यटर्स फेडरेशन और फेडरेशन आफ एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स आफ इंडिया ने।बंगाल में इस हड़ताल की पूरी तैयारी है।गैस वितरक तेल कंपनियों की ओर से गैस अनुशासन जारी करने के खिलाफ यह हड़ताल कर रहे हैं।


रसोई गैस के रहते अब शायद रोसोी गैस में आग जलाने की जरुरत नहीं पड़ेगी।गैस आग बनकर झुलसाती रहेगी,ऐसा पुख्ता इंतजाम है।आपके बवाल के बावजूद पहली अप्रैस से गैस की कीमतों में होने वाला दोगुणा इजाफा रुक नहीं रहा है। न तेलमंत्री के खिलाफ जाती हुई दिल्ली सरकार के एफआईआर का कोई असर होने जा रहा है। तेलमंत्री मोइली ने साफ कर दिया है कि गैस की कीमतें तो बढ़कर रहेंगी।


सब्सिडी खत्म करने का कार्यक्रम किस अंजाम तक पहुंचेगा,इसे साक्षात देखने और झेलने से पहले लोकसभा चुनाव है और उसके बाद नई सरकार की ओर से लोकलुभावन तमाम बंदोबस्त खत्म करने वाला बजट भी। लेकिन विनियंत्रित रसोई गैस नंदन निलेकणि के आधार पद त्यागकर संसदीय राजनीति में छलांगने और नकद सब्लिडी के लिए आधार लिंक की अनिवार्यता खत्म होने के बावजूद आम उपभोक्ता को कोई राहत नहीं देने वाली है।



शायद रसोई संकट से निजात पाने के लिए आम लोगों की रोजमर्रे की नर्क जिंदगी के बहाने फास्ट फूड,रेडीमेड जंक फूड और होमडेलीवरी का कारोबार बढ़े और कुछ बेरोजगार युवाों को बेरोजगारी के आलम में रोजगार की नई दिशा भी मिले।


लेकिन अप्रैल आने से पहले आधार संकट निपट जाने के बावजूद गैस का संकट फरवरी में ही कोहराम मचाने वाली है।


आगामी 25 फरवरी से गैस वितरकों ने रसोई गैस हड़ताल का ऐलान कर दिया है।


इसी महीने की 25 तारीख के बाद रसोई गैस की आपूर्ति में बाधा पहुंच सकती है। सरकार की हालिया नीतियों से परेशान एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटरों ने अपनी मांगों के समर्थन में अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की घोषणा की है। पेट्रोलियम मंत्रालय अपनी तरफ से इन्हें मनाने की कोशिश कर रहा है। यह दीगर है कि इनकी अधिकांश मांगों को मौजूदा ही नहीं, कोई भी सरकार स्वीकार नहीं कर सकती। एलपीजी वितरक एजेंसियों की प्रमुख मांग यह है कि देश में रसोई गैस सिलेंडरों की एक ही कीमत होनी चाहिए। सब्सिडी व गैर-सब्सिडी का चक्कर खत्म किया जाना चाहिए।

ऑल इंडिया एलपीजी डिस्ट्रीब्यूशन एसोसिएशन के महासचिव चंद्र प्रकाश का कहना है, देश की सभी 1,3500 एलपीजी एजेंसियां काम करना बंद कर देंगी। न बुकिंग की जाएगी और न ही पहले से बुक सिलेंडरों की आपूर्ति की जाएगी। सरकार ने एक ही सिलेंडर की तीन तरह की कीमतें तय कर रखी हैं। घरेलू उपयोग के लिए सब्सिडी वाले सिलेंडर की कीमत 400 से 450 रुपये के बीच है। घरेलू उपयोग के लिए गैर सब्सिडी वाले सिलेंडर की कीमत 1,240 से 1,275 रुपये के बीच है। कॉमर्शियल इस्तेमाल वाले सिलेंडर की कीमत 1,850 से 1,900 रुपये के बीच है। इससे न सिर्फ वितरक एजेंसियों, बल्कि ग्राहकों के बीच काफी भ्रम है। आए दिन गैस डिस्ट्रीब्यूटरों को ग्राहकों के गुस्से का शिकार होना पड़ रहा है। मार पीट होती है। कालाबाजारी भी होती है। इसे खत्म करने का एक ही तरीका है कि देश में एलपीजी सिलेंडरों की कीमत एक ही हो।



इसी बीच भूतहा बुकिंग से बारह सब्सि़डी सिलिंडर की जिन्हें जरुरत ही नहीं पड़ती,उनके गैस सिलिंडर बंगाल भर मे इधर उधर हो रहे हैं।


वितरकों की मिलीभगत से कारिंदों की चांदी है।


अब समस्या है कि पहले ही बुकिंग हो जाने की वजह से नये सिरे से तत्काल बुकिंग होगी नहीं।हुई भी तो गैस मिलेगी नहीं।


वैकलपिक बंदोबस्त फिर बिजली के रेगुलेटेड चूल्हा इंडक्शन है। लेकिन बिजली भी सस्ती हो नही रही है।


गौरतलब है कि सरकार ने शुक्रवार को कहा कि उपभोक्ता अब बिना आधार खाते के एलपीजी सिलेंडर खरीद सकते हैं और इसके बारे में एक सप्ताह के भीतर आदेश जारी कर दिया जाएगा।जाहिर है कि सरकार इस मांग को स्वीकार नहीं कर सकती, क्योंकि इसका मतलब हुआ कि या तो सब्सिडी को पूरी तरह से हटा दिया जाए या फिर सभी को सब्सिडी दी जाए। खास तौर पर तब जब चुनाव सर पर है और सरकार ने आधार कार्ड के जरिये एलपीजी सब्सिडी देने की योजना इसलिए स्थगित की है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को सब्सिडी दी जाए। एलपीजी वितरकों की दूसरी मांग है कि उन्हें ऐसे सिलेंडर दिए जाएं जिनके साथ छेड़खानी करना संभव नहीं हो। इनका कहना है कि इसकी आड़ में निगरानी निरीक्षक काफी परेशान करते हैं। यह भी फिलहाल संभव नहीं है, क्योंकि पांच वर्ष पहले सरकार ने इस बारे में दो प्रस्तावों पर विचार किया था, लेकिन अमल के नाम पर कुछ नहीं हुआ। एजेंसियों की एक अन्य मांग है कि बाजार में खुले आम बिकने वाले तीन किलो और पांच किलो के छोटे सिलेंडरों पर रोक लगाई जाए। इन्होंने जल्द से जल्द नई गैस एजेंसियों को खोलने की भी मांग की है।


लोकसभा में सौगत राय के पूरक प्रश्न के उत्तर में पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली ने एलपीजी को आधार कार्ड से अलग करने पर स्थिति स्पष्ट करते हए कहा कि एक सप्ताह के भीतर स्पष्टीकरण से संबंधित सर्कुलर जारी कर दिया जाएगा।


मंत्री ने कहा कि जहां तक सीधे नकद अंतरण (डीबीटी) का सवाल है, कैबिनेट ने आधार खाते को एलपीजी सिलेंडर जाने से अलग करने का निर्णय किया है। अब सब्सिडी आधारित एलपीजी सिलेंडर बिना आधार के ही मिल सकेगा।


नवउदारवाद से उपजी चुनौतियां

नवउदारवाद से उपजी चुनौतियां

Saturday, 22 February 2014 11:37

प्रभात पटनायक

जनसत्ता 22 फरवरी, 2014 : यूपीए सरकार और राजग सरकार और यहां तक कि 'तीसरे मोर्चे' की

अल्पायु सरकार भी आर्थिक नीतियों के मामले में एक जैसी ही रहीं। आज भी, जब चुनावी विकल्प के रूप में राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी का शोरशराबा हो रहा है, आर्थिक नीतियों के स्तर पर शायद ही कोई बुनियादी फर्क हो। सच्चाई तो यह है कि मोदी खुद इस बात पर जोर देते हैं कि उनमें 'शासन करने' की यूपीए के मुकाबले बेहतर क्षमता है, आर्थिक नीतियों के मामले में कोई बुनियादी अंतर नहीं, जिनसे अवाम की बदहाली दूर हो सके। इससे यही साबित होता है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में अवाम के सामने आर्थिक नीतियों के स्तर पर वास्तविक विकल्प मौजूद नहीं है।

 

इस बुनियादी तथ्य के अलावा इस युग में देश के वर्गीय ढांचे में कुछ ऐसे बदलाव आए हैं जिनकी वजह से भी विकल्प की ओर बढ़ पाने में दुश्वारी आ रही है। इन तब्दीलियों में एक बुनियादी तब्दीली यह है कि मजदूरों और किसानों की शक्ति में कमी आई है। चूंकि राज्यसत्ता की रीति-नीति तो वित्तीय पूंजी को खुश करने की है, इससे उसकी भूमिका बड़ी पूंजी के हमले से छोटे कारोबार और उत्पादन की रक्षा करने या मदद करने की नहीं रह जाती।

इस असुरक्षा के माहौल में छोटे उत्पादक, मसलन किसान, दस्तकार, मछुआरे, शिल्पी आदि और छोटे व्यापारी भी शोषण की मार झेलने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। यह शोषण दोहरे तरीके  से होता है। एक तो प्रत्यक्ष तौर पर बड़ी पूंजी उनकी संपदा जैसे उनकी जमीन वगैरह को कौड़ियों के मोल खरीद कर। दूसरे, उनकी आमदनी में गिरावट पैदा करके। इससे लघु उत्पादन के माध्यम से उनकी जिंदा बने रहने की क्षमता कम रह जाती है। अपनी आजीविका के साधनों से वंचित ये लोग काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं, इससे बेरोजगारों की पांत और बढ़ती जाती है।

इसके साथ ही नवउदारवादी अर्थव्यवस्था में नए रोजगार भी सीमित ही रहते हैं, भले आर्थिक विकास में तेजी दिखाई दे रही हो। उदाहरण के तौर पर, भारत में ऊंची विकास दर के दौर में भी रोजगार की वृद्धि दर, 2004-5 और 2009-10 में, राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक 0.8 प्रतिशत ही रही। जनसंख्या की वृद्धि दर 1.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही और इसे ही काम के लायक जनसंख्या की वास्तविक वृद्धि दर माना जा सकता है। इसमें उन लघु उत्पादकों को भी जोड़ लें जो अपनी आजीविका से वंचित हो जाते हैं और रोजगार की तलाश में शहर आ जाते हैं तो बेरोजगारी की विकास दर 1.5 प्रतिशत से ज्यादा ही ठहरेगी। उसमें केवल 0.8 प्रतिशत को रोजगार मिलता है, तो इसका मतलब यह है कि बेरोजगारों की रिजर्व फौज की तादाद में भारी मात्रा में इजाफा हो रहा है। इसका असर मजदूर वर्ग की सौदेबाजी की ताकत पर पड़ता है। वह ताकत कम हो जाती है।

इस तथ्य में एक सच्चाई और जुड़ जाती है, यानी बेरोजगारों की सक्रिय फौज और रिजर्व फौज के बीच की अंतररेखा का मिट जाना। हम अक्सर सक्रिय फौज को पूरी तरह रोजगारशुदा मान कर चलते हैं, रिजर्व फौज को पूरी तरह बेरोजगार। मगर कल्पना कीजिए, सौ में नब्बे को रोजगारशुदा और दस को बेरोजगार मानने के बजाय, यह मानिए कि ये अपने समय के 9/10 वक्त तक ही रोजगार में हैं, इससे वह धुंधली अंतररेखा स्पष्ट हो जाएगी जिसे हम रोजगार में 'राशन प्रणाली' या सीमित रोजगार अवसर की प्रणाली के रूप में देख पाएंगे।

दिहाड़ी मजदूर की तादाद में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, स्थायी और अस्थायी नौकरियों में लगे लोग, या खुद कभी-कभी नए काम करने वाले लोग जो किसानों के पारंपरिक कामों से हट कर हैं, यही दर्शाते हैं कि रोजगारों में सीमित अवसर ही उपलब्ध हैं। बेरोजगारों की तादाद में बढ़ोतरी जहां मजदूरों की स्थिति को कमजोर बनाती है, वहीं रोजगार के सीमित अवसर इन हालात को और अधिक जटिल बना रहे हैं।

'रोजगारों के सीमित होने के नियम' में तब्दीली के अलावा रोजगार पाने के नियम भी बदले हैं जिनके तहत स्थायी नौकरियों के बजाय ठेके पर काम कराने की प्रथा चल पड़ी है। हर जगह 'आउटसोर्सिंग' के माध्यम से बड़े ठेकदारों से काम लिया जाता है जो भाड़े पर वही काम कराते हैं जो पहले उस विभाग में स्थायी कर्मचारी करते थे (रेल विभाग इसका उल्लेखनीय उदाहरण है)। इससे भी मजदूरों की सौदेबाजी की, यानी हड़ताल करने की क्षमता में कमी आई है।

दो अन्य तथ्य इसी दिशा का संकेत देते हैं। एक उद्योगों का निजीकरण, जो कि भूमंडलीकरण के दौर में तीव्र गति हासिल कर रहा है। यूनियन सदस्यों के रूप में मजदूरों का प्रतिशत पूरी पूंजीवादी दुनिया में प्राइवेट सेक्टर के मुकाबले पब्लिक सेक्टर में ज्यादा है। अमेरिका में जहां प्राइवेट सेक्टर में केवल आठ प्रतिशत मजदूर यूनियन सदस्य हैं, वहीं सरकारी क्षेत्र में, कुल संख्या का एक तिहाई यूनियन सदस्य हैं जिनमें अध्यापक भी शामिल हैं।

सरकारी क्षेत्र का निजीकरण इस तरह यूनियन सदस्यता में कमी लाता है और इस तरह मजदूरों की हड़ताल करने की क्षमता कम होती जाती है। फ्रांस में पिछले दिनों कई बड़ी हड़तालें हुई हैं तो इसकी एक वजह यह भी है कि सारे विकसित पूंजीवादी देशों के पब्लिक सेक्टरों के यूनियनबद्ध मजदूरों की संख्या के मुकाबले फ्रांस में उनकी तादाद अब भी सबसे ज्यादा है।

एक और कारक भी है, जिसे 'रोजगार बाजार में लचीलापनह्ण कहते हैं, जिसके द्वारा मजदूरों के एक सीमित हिस्से को (फैक्टरी में एक खास संख्या के मजदूरों से ज्यादा रोजगारशुदा होने पर) श्रम कानूनों के तहत जो सुरक्षा मिली हुई है (जैसे मजदूरों को निकालने के लिए तयशुदा समय का नोटिस देना), उसे भी खत्म करने की कोशिश चल रही है।

यह अभी भारत में नहीं हो पाया है, हालांकि इसे लागू करवाने का दबाव बहुत ज्यादा है। 'रोजगार बाजार में लचीलापन' का यह दबाव कम अहम लग सकता है क्योंकि इसका असर सीमित मजदूरों की तादाद पर ही दिखाई दे सकता है, मगर इसका मकसद उन मजदूरों से हड़ताल करने की क्षमता छीन लेना है जो अहम सेक्टरों की बड़ी-बड़ी इकाइयों में काम कर रहे हैं और जिनकी हड़ताल-क्षमता सबसे ज्यादा है।

ये तमाम तब्दीलियां यानी मजदूरों की संरचना में, सौदेबाजी की उनकी क्षमता में, कानून के तहत मिले उनके अधिकारों में आई तब्दीलियां मजदूर वर्ग की राजनीति की ताकत को कमजोर बनाने में अपनी भूमिका निभा रही हैं। ट्रेड यूनियनों के कमजोर पड़ने का असर स्वत: ही मजदूर वर्ग के राजनीतिक दबाव के कमजोर होने में घटित होता है, एक वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक समाधान आगे बढ़ाने की उसकी क्षमता भी कमजोर होती है, और उसके इर्दगिर्द अवाम को लामबंद करने में दुश्वारियां आती हैं। इस तरह कॉरपोरेट-वित्तीय पूंजी भूमंडलीकृत पूंजी से गठजोड़ करके जितनी ताकतवर होती जाती है, उतनी ही मजदूर वर्ग, किसान जनता और लघु उत्पादकों की राजनीतिक ताकत में कमजोरी आती है, वे गरीबी और जहालत की ओर धकेल दिए जाते हैं। भूमंडलीकरण का युग इस तरीके से वर्ग-शक्तियों के संतुलन में एक निर्णायक मोड़ ले आया है।

इस परिवर्तन के दो अहम नतीजे गौर करने लायक  हैं। पहला, वर्गीय राजनीति में गिरावट के साथ 'पहचान की राजनीति' वजूद में आती है। दरअसल, पहचान की राजनीति एक भ्रामक अवधारणा है क्योंकि इसमें अनेक असमान, यहां तक एक दूसरे के एकदम विपरीत तरह के आंदोलन समाहित हैं। यहां तीन तरह के अलग-अलग संघटकों की पहचान की जा सकती है।

एक, 'पहचान से जुड़े प्रतिरोध आंदोलन' जैसे दलित आंदोलन या महिला आंदोलन, जिनकी अपनी-अपनी विशेषताएं भी हैं। दूसरे, 'सौदेबाजी वाले पहचान आंदोलन' जैसे जाटों की आरक्षण की मांग, जिसकी आड़ में वे अपनी स्थिति मजबूत बना सकें। तीसरे, 'पहचान की फासीवादी राजनीति' (जिसकी स्पष्ट मिसाल सांप्रदायिक फासीवाद है) जो हालांकि एक खास पहचान-समूह से जुड़ी हुई है और दूसरे पहचान-समूहों के खिलाफ  जहरीला प्रचार करके उन पर हमला बोलती है।

इस राजनीति को कॉरपोरेट वित्तीय पूंजी पालती-पोसती है और इसका वास्तविक मकसद उसी कॉरपोरेट जगत को मजबूती प्रदान करना होता है, न कि उस पहचान-समूह के हितों के लिए कुछ करना, जिनके नाम पर वह राजनीति संगठित होती है। जहां ये तीनों तरह की 'पहचान राजनीतियां' एक दूसरे से काफी जुदा हैं, वर्गीय राजनीति में आई कमजोरी का अहम असर उन सब पर है। इस तरह की राजनीति ऐसे किसी खास पहचान-समूह को 'पहचान के नाम पर सौदेबाजी की राजनीति' के माध्यम से एक उछाल प्रदान करती है जो अपने वर्गीय संगठनों के तहत कोई असरदार काम नहीं कर सकते। इस राजनीति से 'पहचान की फासीवादी राजनीति' को भी बल मिलता है क्योंकि कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजात का वर्चस्व इस तरह की राजनीति को बढ़ावा देता है। जहां तक 'प्रतिरोध के पहचान आंदोलनों' का सवाल है, वर्गीय राजनीति के चौतरफा कमजोर पड़ने से उनमें भी प्रगतिशीलता का तत्त्व कमजोर हुआ है और इससे वे भी अधिक से अधिक 'सौदेबाजी की पहचान राजनीति' की ओर धकेल दिए गए हैं।

कुल मिला कर, वर्गीय राजनीति में गिरावट से 'पहचान की राजनीति' के ऐसे रूपों को मजबूती हासिल हुई है जो व्यवस्था के लिए कोई खतरा पैदा नहीं करते बल्कि उलटे, अवाम के एक हिस्से को दूसरे के खिलाफ  खड़ा करके इस व्यवस्था के लिए किसी आसन्न चुनौती की संभावना को कमजोर ही करते हैं। इससे उस नई संरचना के विचार को आघात पहुंच रहा है जिसमें, देश के भीतर जाति आधारित सामंती व्यवस्था के तहत 'पुरानी व्यवस्था' को ढहा कर, उसकी जगह 'नई सामुदायिक व्यवस्था' की स्थापना पर बल था, जो कि हमारे जनतंत्र की मांग है।

स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि इन हालात में प्रगतिशील ताकतें क्या कर सकती हैं? हेगेलीय दर्शन से उलट और इतिहास का अंत वाले अंग्रेजी राजनीतिक अर्थशास्त्र से उलट, मार्क्स ने सर्वहारा को बदलाव के एजेंट के रूप में देखा था जो सिर्फ इतिहास को आगे नहीं ले जाता बल्कि खुद 'इतिहास के फंदे' से मानवजाति के निकलने की सूरत भी बनाता है।

बावजूद इसके कि नवउदारवाद ने वर्गीय राजनीति को कमजोर किया है, जरूरत इस बात की है कि न सिर्फ मजदूरों को संगठित करने के लिए नए क्षेत्रों की ओर बढ़ा जाए, मसलन अब तक असंगठित रहे मजदूरों और घरेलू कामगारों को संगठित करना, बल्कि वर्गीय राजनीति के लिए नए किस्म के हस्तक्षेप भी किए जाएं।

सबसे अधिक जिस चीज की जरूरत है, वह है नवउदारवाद के वैचारिक वर्चस्व को स्वीकार न करना। लोकतंत्र पर नवउदारवाद के हमले को रोकने और लोकतंत्र की हिफाजत से आगे समाजवाद के संघर्ष तक जाने के लिए नवउदारवादी वर्चस्व को नकारना और नवउदारवादी विचारों के खिलाफ  प्रति-वर्चस्व गढ़ने का प्रयास करना एक शर्त है। विचारों के इस संघर्ष में लेखकों की केंद्रीय भूमिका है।

 

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কর্পোরেটের টাকায় নয়, জনগণের চলচ্চিত্র উত্‍সব হয় তাঁদেরই চাঁদায় Sanjay Joshi interviewed on Cinema of Resistance

Sanjay Joshi interviewed on Cinema of Resistance

কর্পোরেটের টাকায় নয়, জনগণের চলচ্চিত্র উত্‍সব হয় তাঁদেরই চাঁদায়

সর্বত্র এই উত্‍সব ছড়িয়ে দেওয়ার চেষ্টা চলছে৷ দেশের ছোটো শহরে, গ্রামে, শিল্পাঞ্চলে৷ জানালেন সঞ্জয় যোশী৷ আলাপে সৌমিত্র দস্তিদার 

সৌমিত্র দস্তিদার: আপনি তো অন্য ধারার ছবি নির্মাতাদের কাছে এখন সবচেয়ে গুরুত্বপূর্ণ ব্যক্তি৷ মূল ধারার বাইরে গিয়ে তাদের ছবি বিপণন ও প্রদর্শনের এক বিকল্প পরিসর তৈরি করে দিয়েছেন৷ 

সঞ্জয় যোশী: এ ভাবে বলবেন না৷ এটা একটা সম্মিলিত প্রয়াস৷ অনেকে মিলে এই ভাবনাটা ভেবেছি ও সবাই মিলে কাজটা একটু একটু করে করার চেষ্টা করি৷ তবে যতটা ভাবি, তার সিকিও এখনও করে উঠতে পারিনি৷ 

এই ভাবনা বা প্রেরণা কী ভাবে পেলেন? 

আমি অনেক দিন ধরেই জনসংস্কৃতি মঞ্চের সঙ্গে যুক্ত৷ সক্রিয় কর্মী৷ ওই সংগঠনটি ভাকপা মালে অর্থাত্‍ সি পি আই এম এল লিবারেশন-এর সাংস্কৃতিক সংগঠন৷ ২০০৫-এ এলাহাবাদে এক সম্মেলনে যাই৷ সেখানে সংস্কৃতির বিভিন্ন মাধ্যম নিয়েই কথাবার্তা হচ্ছিল৷ আমার ভাবনায় ছিল নতুন প্রজন্মকে টানতে সিনেমা খুবই গুরুত্বপূর্ণ মাধ্যম৷ জনসংস্কৃতি নেতৃত্বকে বিষয়টি বোঝাই৷ তারাও খুব উত্‍সাহী হন৷ ওই সময় থেকেই সিনেমা অফ রেজিস্টান্স-এর জন্ম৷ 

তা হলে কী এটা বলা যায় যে আপনাদের সংগঠনও লিবারেশনেরই শাখা সংগঠন? 

না, তা একেবারেই নয়৷ বরং বলতে পারেন জনসংস্কৃতি মঞ্চের সঙ্গে আমাদের যোগ আছে৷ তা সে তো গণসংগঠন৷ নির্দিষ্ট রাজনৈতিক দলের সঙ্গে আমাদের প্রত্যক্ষ সম্পর্ক নেই৷ আমাদের সঙ্গে তো প্রচুর তথ্যচিত্র নির্মাতা বা অন্য ধারার পরিচালক যাদের অনেকে লিবারেশনের রাজনীতির সমর্থন করেন না, তারাও তো আছেন৷ নব্বই দশকের যে নয়া উদারবাদী অর্থনীতি এ দেশে জন্ম নিয়েছে, তার প্রভাবে দেশে ধনী-দরিদ্রের পার্থক্য প্রকট হচ্ছে৷ কৃষি শিল্পে সঙ্কট তীব্র হচ্ছে৷ জল, জঙ্গল, জমিন থেকে আদিবাসী জনজাতির লোকে উচ্ছেদ হচ্ছে৷ পাশাপাশি সারা ভারতে প্রতিরোধ আন্দোলনও জোরালো হচ্ছে৷ এই প্রতিরোধী ভারত যাদের ক্যামেরায় ধরা দিচ্ছে আমরা তাদের পাশে আছি৷ থাকবও৷ 

আপনাদের মূল কৃতিত্ব কি অন্য ধারার ফিল্মমেকারদের বিপণন নেটওয়ার্ক গড়ে তোলা? 

দেখুন, সেই কাজটা কিন্ত্ত অন্য দু'একটা সংগঠনও করছে৷ দিল্লির ম্যাজিক ল্যান্টার্ন, কৃতী আরও কেউ কেউ আছে- যারা ডিভিডি বিক্রি বা স্ক্রিনিং-এরও ব্যবস্থা করে দেয়৷ আমরা কিন্ত্ত সেখানেই থেমে নেই৷ যেহেতু আমরা গণ-আন্দোলনকে বিকশিত করতে সিনেমাকে ব্যবহার করছি তাই শুধু বছরে একটা উত্‍সব বা নির্দিষ্ট কিছু ডি ভি ডি বিক্রি না করে আমরা লাতিন আমেরিকান অন্য ধারার সিনেমা পরিচালক ফ্রান্সিস বিররি যেমন বলতেন 'অ্যাকটিভ সিনেমার জন্যে চাই অ্যাকটিভ দর্শক'৷ আমরা এই ক'বছরে দেশের বিভিন্ন শহরে সে রকম দর্শকও অল্প হলেও তৈরি করতে পেরেছি৷ সিনেমা অফ রেজিস্ট্যান্স-এর সেটাই সবচেয়ে বড়ো কৃতিত্ব৷ 

এ কথাটা অবশ্য আমাদের বন্ধু সঞ্জয় কাকও বলেছেন, যে যোশীরা এমন সব জায়গায় সিনেমাকে নিয়ে গিয়েছে যেখানে সে অর্থে ভালো সংস্কৃতির কোনও পরিসরই ছিল না৷ সঞ্জয় এ-ও বলেছে যে ছোটো ছোটো শহরে ওই উত্‍সব যখন হয় তখন সত্যি সত্যি গোটা এলাকা কোন জাদুমন্ত্রে যেন জেগে ওঠে৷ দূরদূরান্ত থেকে লোকে সিনেমা দেখতে আসে৷ ডিভিডি কেনে, সব মিলিয়ে মেলা মেলা পরিবেশ৷ জনগণের উত্‍সব৷ তাই? 

একশো ভাগ সত্যি৷ দু'হাজার ছয় থেকে উত্‍সব করছি৷ এখন চোদ্দ সাল৷ এই ন'বছরে কোথায় না কোথায় পৌঁছেছি৷ গোরখপুর, ভিলাই, আজমগড়, বেরিলি, নৈনিতাল, বালিয়া, লখনৌ, উদয়পুর, এলাহাবাদ৷ এক গোরখপুরেই জনগণের দাবিতে দু'দুবার উত্‍সব করেছি৷ প্রথম বারের অভিজ্ঞতা এখনও মনে আছে৷ গো-বলয়ের ও সব জায়গা সবাই জানেন দক্ষিণপন্থী৷ নব্য হিন্দুত্ববাদীদের শক্ত ঘাঁটি৷ ছবি দেখাবার জায়গাই পাওয়া কঠিন৷ আমাদের কর্মীরাও চিন্তায় ছিলেন কাজটা করা যাবে কি না৷ হিন্দু যুব ব্রিগেড হুমকিও দিয়ে রেখেছিল- এখানে এ সব চলবে না৷ কিন্ত্ত আমরা সাহস করে দেখিয়ে ছিলাম- জনগণ সঙ্গে থাকলে সব কিছুই সম্ভব৷ শতধারা নামে একটি সংগঠন তথ্যচিত্রের উত্‍সব করছে যাদবপুরের ইন্দুমতী সভাঘরে৷

এত এত উত্‍সবে আপনারা টাকা পান কী ভাবে? 

এটা খুব গুরুত্বপূর্ণ প্রশ্ন৷ আমরা কখনও কোনও কর্পোরেট স্পনসরশিপ নিই না৷ আক্ষরিক অর্থে জনগণের উত্‍সব করি জনগণের কাছ থেকে চাঁদা তুলে৷ আমাদের কর্মীরা জানে অনেক জায়গায় বিভিন্ন কর্পোরেট সংস্থা মোটা টাকা দেওয়ার লোভ দেখিয়েছে, আমরা প্রত্যাখ্যান করেছি৷ মনে আছে, আজমগড়ে কী ভাবে উত্‍সব করব ভাবছি, সেখানকার ধর্মনিরপেক্ষ নামী ডাক্তাররা সব শুনে বললেন আমরা আছি তোমরা এগিয়ে যাও৷ ভালো সংস্কৃতির চর্চা হলে আমাদের শহরের সুনাম বাড়বে৷ মিডিয়ার দৌলতে কাইফি আজমির শহরকে এখন লোকে জানে ডাকাতদের, স্মাগলারদের জায়গা বলে৷ কতটা সুনাম ফেরাতে পেরেছি জানি না কিন্ত্ত প্রগতির সঙ্গে সামান্য হলেও একটা হাওয়া তুলতে পেরেছি৷ 

কাইফি আজমির কথায় মনে পড়ে গেল আপনারা তো সিনেমার পাশাপাশি কবিতাকেও সমান গুরুত্ব দিচ্ছেন৷ 

আমরা আই পি টি-এর সোনার যুগের মতো শিল্পসাহিত্যের সব প্রগতিশীল ধারাকেই সমান প্রয়োজনীয় মনে করি৷ সিনেমা অফ রেজিস্ট্যান্স আসলে ম্যাকডোনাল্ডাইজেশন ও দক্ষিণপন্থী সংস্কৃতির বিপরীতে জনগণের শ্রমজীবীর সংস্কৃতির পাশে৷ যা উন্নত সমাজ নির্মাণে ভূমিকা নেয়৷ আমরা সিনেমা উত্‍সবের সঙ্গেই ছোটো ছোটো চারটে বইও বের করেছি৷ তার দুটো সিনেমা নিয়ে৷ অন্য দু'টি কবিতার৷ আরও কিছু লেখা, গদ্য পদ্য প্রবন্ধও আগামী দিনে করার ইচ্ছে আছে৷ কিছু কাজও এগিয়েছে৷ 

আপনারা শুনেছি ছোটো শহরের পাশাপাশি গ্রাম ও শিল্প এলাকাতেও ছবি দেখান? 

নিশ্চয়৷ উত্তর ভারতের প্রত্যন্ত গ্রামে আমরা এম এস সথ্যুর 'গর্ম হাওয়া' দেখিয়েছি৷ মারুতি শ্রমিকদের ধর্মঘটের সময় আমরা প্রতিরোধের সিনেমা নিয়ে সঙ্গে থেকেছি৷ 

এ বার কলকাতার পিপলস ফিল্ম ফেস্টিভ্যাল নিয়ে কিছু বলুন৷ 

কলকাতায় এই পিপলস ফিল্ম ফেস্টিভ্যাল কনসেপ্টটাই নতুন৷ 

একটু থামাচ্ছি৷ তার কারণ কনসেপ্টটা এ শহরেও ঠিক নতুন নয়৷ ডকুমেন্টারিওয়ালা বলে একটা সংগঠন এর আগে দু'হাজার ছয় সাত আটে রাজাবাজার, পার্ক সার্কাস বস্তি ও ময়দানে খোলা মাঠে পর্দা টাঙিয়ে অন্য ধারার সিনেমার উত্‍সব করেছে৷ তবে তা শুধুই ডকুমেন্টারি৷ এ ছাড়া লীলা মোচ্ছব ও আলতামিরাও কিন্ত্ত আপনাদের কাজটাই নীরবে করছে গত এক দেড় বছর ধরে৷ ডকুমেন্টারিওয়ালা এ বছরও ২৯ জানুয়ারি থেকে ৩ ফেব্রুয়ারি ত্রিকোণ পার্কে পর্দা টাঙিয়ে যৌনকর্মীদের সংগঠন দুর্বার মহিলা সমন্বয় কমিটির উত্‍সব- প্রতিবাদে নারী প্রতিরোধে নারী, রোজ এক ঘণ্টা ধরে বিকল্প ধারার তথ্যচিত্র দেখাচ্ছে৷ বোধ হয় এগুলো আপনার ঠিক জানা নেই৷ 

ঠিকই৷ এত সব তথ্য আমাকে কেউ জানায়নি৷ তবে আমরা ২০, ২১, ২২ জানুয়ারি যাদবপুরে ত্রিগুণা সেন ভবনে যে উত্‍সব করেছি সকাল দশটা থেকে রাত ন'টা অবধি সেখানে তথ্যচিত্র, অন্য ধারার সিনেমার সঙ্গে দেশের বিভিন্ন রাজ্যে গণআন্দোলন নিয়ে সিরিয়াস সেমিনারও হয়েছে৷ উদ্বোধন করেছেন শমীক বন্দ্যোপাধ্যায়৷ এখানে পুরনো ক্লাসিকও দেখানো হয়েছে৷ আবার সাম্প্রতিক বিষয় নিয়েও একদম নতুন ছবিও রাখা হয়েছিল৷ রঞ্জন পালিত, বসুধা যোশীর ভয়েসেস ফ্রম বালিয়াপাল, শ্রীপ্রকাশ, মঞ্জিরা দত্ত, বিরজু টোপ্পোর ফিল্মের সঙ্গে সঞ্জয় কাক, মারুতি শ্রমিকদের সংগ্রাম ও সম্প্রতি ঘটে যাওয়া মুজফফরপুর গণহত্যা নিয়ে তৈরি নকুল সিং সোনির ডকুমেন্টারি, পস্কো কৃষক সংগ্রাম নিয়ে সূর্যশঙ্কর দাসের তথ্যচিত্রও দেখানো হয়েছে৷ আর একটা কথা৷ এই পিপলস ফেস্টিভ্যাল উত্‍সর্গ করা হয়েছিল বিশিষ্ট চিত্রশিল্পী জয়নুল আবেদিনের জন্ম শতবর্ষে তাঁকে শ্রদ্ধা জানিয়ে৷ 

কলকাতায় বাজেট কত? 

খুব বেশি হলে পঁচানব্বই হাজার থেকে এক লাখ৷ সবই কিন্ত্ত সেই জনগণের কাছ থেকে চাঁদা তুলে৷ 

সঞ্জয় যোশী চলচ্চিত্রনির্মাতা ও বিকল্প চলচ্চিত্র আন্দোলনের সক্রিয় কর্মী 

Please do not make a Kashmir in the North east,Mr Prime Minister in waiting!

Please do not make a Kashmir in the North east,Mr Prime Minister in waiting!

Palash Biswas

We should welcome that Prime Ministerial candidate Narendra Modi condemned the recent attacks on students of the North East.But he kept silence on Armed Forces Special Power Act in attempt to harvest lotus in the excluded geography of the nation subjected to military repression and racial apartheid.


Modi opened his eye floodgates to sympathize with the killed young student in New Delhi,but he failed to express his support to Irom Sharmila.


May be,I might be wrong. I have no prejudice or pride.


I just failed to listen whether Mr Modi did say anything about Irom Sharmila`s prolonged hunger strike demanding to end the AFSPA rule in the North east.


I have doubts about the fertility potential of Hindutva despite the blooming lotus hype projected by media round the clock.


In Arunachal,his speech as the most potential prime ministerial candidate,perhaps as the next prime minister disappointed.His tone and text are exclusive in nature.


It has very serious security implications in the context of Indo Sino border dispute and in reference to non Hindu demography of the tribal mongoloid North East.


However,Narendra Modi tried his best to extend Gujarat to North East marketing  his well branded  hate campaign of high equity value provoking North Eastern sentiments.


It is very very dangerous.


It proves that the Hindutva brigade is not least concerned with the North East people and their fight against Delhi`s Military rule.


North East seems to be yet another Kashmir for the Shafron agenda which wants a complete geography without caring for either the history or the demography.It is Hindutva point of view n Kashmir reflected in Modi unilateral hate campaign in the North East.


It is blessing that the Hindutva failed to have any major impact in the North East despite its omnipresence in the largest state Assam under constant turmoil.


I am unaware of the fact whether Mr Modi did ever had any stand on NorthEast subjected to racial apartheid or military rule.


We,however,know Modi`s Sanghi policies on Kashmir.


For me, Modi seems to replicate Kashmir in the North East.


I am least concerned who would be the next prime minister as it would make no difference whatsoever as the polity is unofficially captured by bipolar Hindutva Politics with the reign always remaining in the hands of the ruling monopolistic hegemony.


Unless the system is not changed,no change is possible.


While our best of friends and activists countrywide joined Kejriwal Brigade and Mr Kejriwal has clarified that he in not against capitalism.


The total revolution seems to be aborted midway as the AAP thinks tanks have been indulged in wooing the foreign investors.


I feel quite disappointed for my respected dear friends whom I refrain to criticize as I know very well that we have to fight against the military rule, repression, displacement, destruction all round and economic ethnic cleansing just after the elections.


My wife Sabita had stopped to see TV news while Chandrashekhar was the prime minister just because of his socialist hypocricy.


I am afraid that provided Modi becomes the next prime minister we have to skip all fragments and forms of corporate media.Modi campaign has been transformed in an omnipotent hate campaign to provoke blind religious nationalism and we may not bear with.


Just go through the content and rethink about your option.


Please.


Bharatiya Janata Party's prime ministerial candidate Narendra Modi on Saturday launched a scathing attack on the ruling UPA government, saying 2014 General Elections will mark the beginning of the end of the Congress party and India will be free from its rule.


Addressing a rally in Assam's Silchar, Modi attacked the Congress and said that he has never seen an anti-incumbency wave as now. “This wave is going to become a tsunami and the Congress will not be seen in any corner of the country," the BJP leader exhorted.


As the crowds cheered, Modi said that Assam is blessed with natural resources and has everything which can make it a developed state. When the BJP leader asked the crowd who looted the state, those people assembled at the venue shouted 'Congress'.


He appealed to the people to vote for the BJP and said that there must not be any trace of Congress in Assam after the elections.


The country needs a government that is sensitive to the issues of the people of the northeastern states, said BJP's prime ministerial candidate Narendra Modi Saturday.

"The country needs a government that is ready to take initiatives for their development," said Modi at a rally in Pasighat town.

He said that the state "has every potential to be world's environment capital because of the natural resources in the state".

He added: "Herbal medicine, horticulture and handicraft can make the state overcome the issues of unemployment and poverty as it is the sector which has till now has given employment to most number of people."

Attacking the Congress government in the state, he said it had done nothing towards water resource management and solar energy.

"Dynasty, nepotism, casteism will not help the state to come out of the problems the people here are undergoing," he added.

Modi said he was a firm believer in development.

"The lotus will shine in all the states and bring prosperity and progress in the state," said Modi while referring to his party's symbol.

He also said that Arunachal Pradesh was an integral part of India.

"There is no power in the world that can snatch Arunachal Pradesh from India," he said.



Modi said, “Next to Assam is Bangladesh and next to Gujarat is Pakistan. Due to Bangladesh people in Assam are troubled and due to me Pakistan is worried."


Raising the contentious issue of illegal immigrants in Assam, the Gujarat Chief Minister stressed on sending back the immigrants to the neighbouring country.


He accused the Tarun Gogoi government in state of playing vote bank politics. The Gujarat CM further said that the BJP will end the detention camps after coming to power.


Modi stressed on giving a good life to the Hindus coming from other countries. The BJP's PM candidate said, “Be it any nation, if a Hindu is troubled then there is only one place and that is India where the Hindus can come and we will not treat them the same way as they are treated elsewhere."


Modi stressed on giving proper health facilities, quality education and job opportunities to the children of tea garden workers.


If BJP comes to power the party will develop facilities for tea-traders and tea-gardens, Modi said.


Mocking Tarun Gogoi, Modi told the huge gathering that the Assam Chief Minister suffers from sleepless nights when he learns that the Gujarat CM is coming to the state for a rally.


“The CM came to Silchar few days ago and promised many things which have been not happening for years," Modi said. He asked the people not to trust the Congress.


He also accused Gogoi of being insensitive and reminded the audience that during the 2012 Assam floods Gogoi was in the US and after that he travelled to Japan.


Taking a dig at Dr Manmohan Singh, Modi said that the Prime Minister is an MP from Assam but has never done anything for the state.


The BJP leader said that the infiltrators who have come to Assam for political purposes must be sent back to where they belong.


The BJP's PM candidate said that the people from the North-east are good at sports and laid emphasis on opening a sports University in the region.


No power in world can snatch away our territory: Modi in Arunachal


Raising the poll pitch in the Northeast ahead of crucial Lok Sabha elections, Bharatiya Janata Party's prime ministerial candidate raked up the issue of Nido Taniam's death.


Addressing a rally in Arunchal Pradesh's Pasighat, Modi said that he has come to the state with a heavy heart as a son of this land was killed in the national capital last month.


The Gujarat Chief Minister said that he prays to the god to bless Nido's family.


In an apparent attempt to attract the northeastern voters, the BJP leader said that the blood which runs in the people of this region is the same that runs in his veins.


Raking up the 1962 war, Modi said that during the war people of Arunachal didn't come under pressure from China, and the call of 'Jai Hind' reverberates in this land.


He praised the Arunachal people for standing firm against China's repeated pressure tactic. “No power in this world can snatch away our territory,” Modi asserted.


"China should shed its expansionist policy and forge bilateral ties with India for peace, progress and prosperity of both the nations," the BJP PM candidate said.


"I swear in the name of this soil that I will never allow the state to disappear...Breakdown and to bow down," Modi said to a thunderous applause from people gathered near the mighty Siang River.


Laying emphasis on his pet slogan of development, the Gujarat Chief Minister said that he was a firm believer in development and will only focus on this and not on dynasty, nepotism and casteism.


Modi stressed on bringing development to the northeastern state and said that BJP has embraced the development model and will continue to move ahead with the same agenda..


Modi exhorted that Lotus (BJP's poll symbol) will shine in all the northeastern states and there will be prosperity and progress in the region.


In order to attract the young voters, Modi asked why the GenX is unhappy here and why they have to leave their homeland and go out in search for employment.


The BJP leader said that he was in Arunachal with the message of development and asked the people gathered in the rally, “Can we trust the Government in Delhi?”


He said that a government which is sensitive to the problems in every part of this state and listens to the people should be in power.


The BJP's PM candidate further stressed on improving the water resource management in the Northeast.


imputes from Zeenews

Bangladeshis troubling northeast due to wrong governance: Modi


Due to wrong governance, illeggal Bangladeshis are causing trouble for the people of the northeastern states, but due to governance in Gujarat, Pakistan has been facing problems,BJP prime ministerial candidate Narendra Modi said here Saturday.

"Due to the Bangladeshi people and incorrect governance, the people of the northeastern states are in trouble. But due to governance in Gujarat, Pakistan is now in awkward position," the Gujarat chief minister said at a 'Naba Chetana' (fresh consciousness) rally here. It was his third in the northeast on Saturday after Pasighat in Arunachal Pradesh and Silchar in Assam

Praising the erstwhile Tripura kings for keeping the state in the Indian Union, the BJP leader said that composers Sachin Dev Barman and Rahul Dev Barman, who hailed from Tripura, had achieved nation glory through their works.

"The people of Gujarat voted BJP (Bharatiya Janata Party) in power for three times, but the people of Tripura have been facing tremendous sufferings though they voted the Left Front many times," he added.

"Left parties always want to keep the people in backward so that they remain their followers," he added.

Criticising the possible formation of a Third Front, the BJP leader said it was always formed before the general elections but collapsed after that.

"Only the BJP's model can make the country progress. This was proved by the Atal Bihari Vajpayee-led government at the center," the Gujarat chief minister said adding that the agricultural growth in his state was ten percent, the highest in the country.