Tuesday, January 31, 2012
FICCI Presses for PRIVATISATION of Caol india. Meets PM. Reports Mulnivasi Nayak Marathi!ATTEMPT to Legalise ILLEGAL ADHAAR PROJECT CORPORATE!
युध्द के मुहाने पर खाड़ी (09:36:19 PM) 30, Jan, 2012, Monday
| युध्द के मुहाने पर खाड़ी |
| (09:36:19 PM) 30, Jan, 2012, Monday |
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डॉ. रहीस सिंह ईरान और अमेरिका के बीच लम्बे समय से चूहे-बिल्ली का खेल चल रहा है जिसे आरम्भ में दुनिया ने भले ही गम्भीरता से न लिया हो, लेकिन अब उसे यह एक ऐसे संकट के रूप में दिखने लगा है जिससे मध्य-पूर्व में कोहराम मच सकता है। अमेरिका, उसके यूरोपीय सहयोगी और यहां तक कुछ अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसियां ईरान को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं लेकिन ईरान इस घेरेबंदी से भयभीत होने की बजाय दुनिया को दबंगई दिखाने की कोशिश में है। लातिनी अमेरिकी देशों के साथ-साथ चीन और रूस के साथ कूटनीतिक सम्बन्धों के जरिए अमेरिका व पूंजीवादी यूरोप विरोधी लॉबी को विस्तार देने की ईरानी मंशा यह बताती है कि ईरान किसी भी कीमत पर पीछे हटने की मन:स्थिति में नहीं है। अब अमेरिका भी उसे परमाणु हथियार विकसित करने से रोकने के लिए किसी भी हद तक जाने की मन:स्थिति में पहुंच रहा है। शांति का आग्रह करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी अब उसी तरह की भाषा बोलते दिख रहे हैं जिस तरह की भाषा का प्रयोग कभी इराक के मामले में जूनियर बुश ने किया था। ऐसी स्थिति में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या अफराशियाब के वंशजों का भी वही हश्र होने वाला है जो कभी 'मरजीना के देश' का हुआ था। कुछ समय पहले अमेरिकी विदेश विभाग के पूर्व सलाहकार इलियट कोहेन ने जब यह बात कही थी कि ईरान के मामले में दो ही विकल्प शेष बचे हैं और इनमें से एक है-युध्द। तब कोहेन के शब्दों में कूटनीतिज्ञों को उतनी स्पष्टता नहीं दिखी थी जो बुश और चेनी युग की विशेषता थी। लेकिन राष्ट्रपति ओबामा की किसी हद तक जाने की बात में बुश और चेनी युग की प्रतिध्वनि स्पष्ट तौर पर सुनी जा सकती है। अमेरिका की ईरान को घेरने की कोशिश और तमाम चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अपने परमाणु कार्यक्रम के प्रति प्रतिबध्दता का प्रकटीकरण, कुछ ऐसी ही अभिव्यक्तियां हैं। हालांकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए अमेरिकी रुख को गलत नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि अब बहुत से ऐसे पक्ष सामने आ चुके हैं जो यह बताते हैं कि ईरान परमाणु बम बनाने के काफी करीब पहुंच चुका है। ईरान यूरेनियम को 20 प्रतिशत तक संवर्धित कर लेने की क्षमता पहले ही प्राप्त कर चुका है और अभी हाल ही में ईरान के वैज्ञानिकों ने पहली बार परमाणु ईंधन छड़ बनाने का दावा भी कर दिया है। ऐसे में अमेरिकी और यूरोपीय देशों का ईरान पर शंका करना जायज है क्योंकि अमेरिका के एक प्रमुख थिंक टैंक का कहना है कि अगर तेहरान यूरेनियम को थोड़ा और संवर्धित कर ले तो उसके पास चार परमाणु बमों के लायक सामग्री मौजूद है। इसलिए अमेरिका द्वारा ईरान के केंद्रीय बैंक पर रोक लगाने सहित उस पर दबाव बनाने के लिए उठाये गये तमाम कदमों को अपेक्षित मानने में किसी को भी कोई परहेज नहीं होना चाहिए। परन्तु एक सवाल है जो अक्सर व्यथित करता है। आखिर ईरान को मध्यपूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ तेज करने की जरूरत क्यों पड़ी? अरब दुनिया का एक शक्तिशाली घटक शिया विरोध में इजराइल के साथ खड़ा है या अमेरिकी लॉबी का हिस्सा है। ऐसे में परमाणु हथियार बनाना और उसे छुपाए रखना ईरान की विवशता है। यही नीति तो इजराइल ने भी अपनाई थी। इजराइल किसी भी युध्द क्षेत्र में भिड़ने के लिए तैयार इसलिए रहा क्योंकि उसके पास परमाणु हथियार थे और उसकी सोच यह थी कि अगर हम युध्द हारने के कगार पर होंगे तो परमाणु हथियार का इस्तेमाल करने से नहीं चूकेंगे। यही आत्मविश्वास उसके आक्रामक रवैये को बढ़ाता गया। अगर ईरान परमाणु बम तैयार कर लेता है तो मध्य पूर्व में वही ऐसी ताकत बन जाएगा जो इजराइल को रोकने समर्थ होगी। ईरानी परमाणु बम को रोकने के पीछे कुछ चिंतकों का तर्क भी माना जाता है कि ईरानी उन्मादी होते हैं। अगर उन्हें इजराइल का सिर मिले तो वे राष्ट्रीय आत्महत्या करने से भी नहीं हिचकेंगे। लेकिन यह सिर्फ क्लासिकी सोच भर है। क्या पाकिस्तानी तालिबानियों की सोच इससे कम वीभत्स है? पाकिस्तान पर कोई कार्रवाई नहीं होगी जबकि ईरान पर सम्भव है। इसकी कई वजहें हैं ईरान के खिलाफ घेरेबंदी के क्रम में अमेरिका ने ईरान के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों को और कड़ा करते हुए उसके तीसरे सबसे बड़े बैंक तिजारत के साथ किसी भी तरह के लेन देन पर रोक लगा दी है। प्रतिबंध के बाद अगर कोई भी विदेशी कंपनी ईरान के तिजारत बैंक और इसके सहयोगी बेलारूस स्थित ट्रेड कैपिटल बैंक के साथ लेन-देन करेगी तो अमेरिका उसके खिलाफ दण्डात्मक कार्रवाई करेगा। उसके केन्द्रीय बैंक पर रोक पहले से ही लग चुकी है। यहां तक तो फिर गनीमत थी लेकिन जिस तरह से यूरोपीय संघ ने जुलाई से ईरान से तेल आयात रोकने का ऐलान किया है, उससे ईरान और पश्चिमी दुनिया के बीच कायम तनाव टकराव में परिवर्तित होने लगा है। दरअसल मध्य-पूर्व के अधिकांश देशों की तरह ईरान की भी अर्थव्यवस्था तेल निर्यात पर ही निर्भर है इसलिए ईरान की अर्थव्यवस्था को क्षति पहुंचाने का कोई भी प्रयास उसकी उग्रता का कारण बनेंगे। हालांकि ये तेल भंडार भी अमेरिका और यूरोपीय दुनिया के लालच का एक बड़ा कारण है। लेकिन इसके साथ ही ईरान का परमाणु बम और उसकी उकसाने वाली हरकतें भी एक वजह है। इनमें से जो वातावरण को सबसे अधिक जटिल बना रही है वह है उसके द्वारा अपनी सैनिक ताकत का प्रदर्शन। उदाहरण के तौर पर होर्मुज जलसंधि में हुए उसके दस दिवसीय नौसैनिक युध्दाभ्यास को देखा जा सकता है जिसके जरिए उसने पूरी दुनिया को दबंगई दिखाने का प्रयास किया है। उसकी इस तरह की हरकतें उसकी गम्भीरता का परिचय कदापि नहीं हो सकतीं क्योंकि ये हरकतें इजराइल और उसके साथ-साथ अमेरिका व यूरोप को आक्रामक होने का जरिया बन सकती हैं। उल्लेखनीय है कि अभी कुछ समय पहले ही इजराइल अमेरिका को पूर्व सूचना के बिना ही, कभी भी ईरान पर हमला करने की धमकी दे चुका है। यह किसी सुखद तस्वीर को निर्मित करने की कवायद हरगिज नहीं हो सकती। ईरान पर पश्चिमी प्रतिबंध और ईरान द्वारा होर्मुज जलसंधि से होने वाले तेल व्यापार पर पाबंदी की धमकियां अब शायद रेड लाइन को पार कर चुकी हैं। अब तक यूरोपीय संघ के कुछ देशों, खासकर ग्रीस, इटली, स्पेन जैसे देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के कारण ईरान के खिलाफ नहीं थे लेकिन अब यूरोपीय संघ ने भी प्रतिबंधों के लिए सैध्दांतिक सहमति दे दी है। वैसे तो यूरोपीय संघ ईरान के तेल निर्यात के पांचवें हिस्से का ही आयातक है, लेकिन ईरान की अर्थव्यवस्था के लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण घटक होगा। इसे और अपने बैंकों पर प्रतिबंध के खिलाफ ईरान प्रतिक्रिया अवश्य व्यक्त करना चाहेगा। इस प्रतिक्रिया का हिस्सा होर्मुज जलसंधि पर प्रतिबंध बन सकते हैं जिनकी धमकियां उसकी तरफ से अक्सर दी जाती हैं। यह क्षेत्र खाड़ी और तेल उत्पादक देश-बहरीन, कुवैत, कतर, सउदी अरब, यूएई को हिंद महासागर से जोड़ता है तथा करीब 40 प्रतिशत तेल यहीं से होकर गुजरता है। इसलिए तेल रोकने सम्बन्धी ईरान की एक भी हरकत खाड़ी में युध्द के लिए उलटी गिनती शुरू कर सकती है। बहरहाल एक और खाड़ी संकट के साथ-साथ एक और तेल संकट दुनिया के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। ईरान के कदमों से इजराइल पहले से ही उग्र रवैया अपनाए हुए है और भावी राष्ट्रपति चुनाव को देखते हुए बराक ओबामा किसी भी कीमत पर यहूदी जनमत के अपने खिलाफ हो जाने का जोखिम उठाना नहीं चाहते। मार्च में ईरान के संसदीय चुनाव होने हैं इसलिए अहमदीनेजाद के पास भी अपनी हमलावर पोजीशन से चुपचाप पीछे हटने का रास्ता नहीं बचा है। फिर खाड़ी को युध्दोन्माद से बचाएगा कौन? 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तख्तापलट या साजिश(09:16:45 PM) 01, Feb, 2012, Wednesdayकुलदीप नैय्यर
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बांग्लादेश में सत्ता पलट की कोशिश नाकाम हो गई है। इसके साथ ही इस बात की पुष्टि भी हो गई कि भारत की खुफिया एजेंसियों ने ढाका के उच्च पदस्थ सैन्य अधिकारियों को शेख हसीना की सरकार के खिलाफ साजिश रचे जाने के बारे में आगाह किया था। बांग्लादेश की सेना समय पर हरकत में आ गई और बगावत को शुरूआत में ही नाकाम कर दिया।
1975 में बंगबंधु शेख मुजीर्बुर रहमान और उनके परिवार के 15 सदस्य सेना के हाथों मारे गए थे। उस वक्त भी भारत की खुफिया एजेंसी ने मुजीब पर हमले के खतरे से आगाह कराया था। लेकिन उस वक्त सेना के बड़े अधिकारी ही बगावत की साजिश में शामिल थे। इस कारण जानबूझ कर सेना हरकत में नहीं आई। नतीजा क्या हुआ, सभी को मालूम है।
बांग्लादेश की सेना ने 2008 में सिविल प्रशासन को सत्ता सौंपी थी। इसके साथ ही इस बात का एहसास हो गया था कि वहां की सेना देश का शासन चलाने को इच्छुक नहीं है। परिणामस्वरूप स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हुआ और संसद में तीन-चौथाई बहुमत के साथ शेख हसीना सत्ता में लौटीं। जिस वक्त सेना बांग्लादेश की कामचलाऊ सरकार को समर्थन दे रही थी और स्थायी सरकार की राह बना रही थी, उसी वक्त उसे पता चल गया था कि शेख हसीना की अवामी लीग और खालिदा जिया की नेशनलिस्ट बांग्लादेश पार्टी के बड़े राजनीतिज्ञ भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। सेना में कई लोग इस बात को लेकर चिंतित थे कि राजनीतिक प्रक्रिया के फिर से बहाल होने से उसी पुराने भ्रष्टाचार की वापसी होगी। इसके बावजूद सेना ने नागरिक शासन को तरजीह दी और प्रतिनिधि चुनने के जनता के अधिकार के आगे झुक गई। लेकिन मतदाता जो चाहते थे, वैसा हुआ नहीं। प्रशासन से जो उम्मीदें थीं वे पूरी नहीं हुर्इं। भ्रष्टाचार और परिवारवाद और यादा बढ़ गया। अब जनता को इनसे संघर्ष करना है। यह काम सेना नहीं कर सकती। लोकतंत्र और तानाशाही का यही अंतर है।
सेना के बयान में कहा गया है कि ''कुछ अप्रवासी बांग्लादेशियों के उकसावे में सेना के कुछ अवकाश प्राप्त और कुछ कार्यरत मतान्ध अधिकारियों ने सेना में अराजकता की स्थिति पैदाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपदस्थ करने की नाकाम कोशिश की। इन्हें कुछ धार्मिक उन्मादियों की मदद मिल रही थी। लेकिन इस घृणित कोशिश को नाकाम कर दिया गया।''
सेना की ओर से आगे कहा गया है : ''सैन्य सेवा के कुछ कार्यरत अधिकारी सेना के जरिए लोकतांत्रिक शासन को अपदस्थ करने की साजिश में शामिल थे।'' एक बड़े सैन्य अधिकारी के खिलाफ जांच हो रही है जबकि एक दूसरा अधिकारी मेजर मोहम्मद जिया-उल-हक फरार है। साफ है कि सेना के कुछ धार्मिक उन्मादी और असंतुष्ट अधिकारियों ने सत्ता पलट की कोशिश की। कारण है कि उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष हसीना सरकार ने कठमुल्लों को सख्ती के साथ दबाया है। जिसके कारण वे लोग सरकार से नाखुश हैं। इसके साथ ही बांग्लादेश में ही भारत की तरह कुछ ताकतें हैं, जो माहौल बिगाड़ने में लगातार जुटी रहती हैं। शेख मुजीर्बुर रहमान की हत्या के वक्त भी यही स्थिति थी। उन्होंने किसी तरह के अतिवादियों और बांग्लादेश के बनने से नाखुश लोगों की कोई परवाह नहीं की थी। सेना में इस्लामी ताकतों का जमावड़ा हो जाने पर शेख हसीना ने खेद व्यक्त किया है। यह ध्यान देने वाली बात है क्योंकि पाकिस्तान में भी ऐसा ही हुआ है।
मेरी जानकारी के अनुसार इस बार सत्ता पलट की कोशिश करने वालों को भारत में कार्यरत ताकतों से मदद मिली है। उल्फा और नागाओं की मौजूदगी बांग्लादेश में रही है। मणिपुर के उग्रवादी भी इस कोशिश में साथ थे। यह आश्चर्य की बात है कि बांग्लादेश अपने यहां भारत विरोधी ताकतों को पनाह नहीं देता। लेकिन इस मामले में भारत पहले से ही आलसी और निष्क्रिय रुख अपनाता आ रहा है। बड़े स्तर पर भारत पर यह दोष जाता है। भारत बांग्लादेश के साथ जुड़ाव नहीं बना सका है।
व्यापार, ऊर्जा और व्यवसाय के क्षेत्र में किए गए वायदे पूरे नहीं हो सके हैं। रिश्तों को सुधारने के लिए शेख हसीना ने एकपक्षीय तरीके से जो कोशिशें की हैं, उसे लेकर बांग्लादेश के बहुत सारे लोगों में नाराजगी है। फिर भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ व्यापार, ऊर्जा और धन के मुद्दे पर जो करार किया था, उस करार को दिल्ली के नौकरशाह कार्यान्वित नहीं होने दे रहे हैं। नौकरशाह बांग्लादेश विरोधी नहीं हैं। लेकिन लालफीताशाही में बंधे हुए हैं, जिसके कारण कोई योजना या परियोजना बहुत धीमी गति से बढ़ती है। ढाका में जिस सेतु की अत्यधिक आवश्यकता है, वह अभी नक्शे में भी नहीं है।
मुझे याद है कि बांग्लादेश जब पाकिस्तान से अलग हुआ था उस वक्त दिल्ली ने एक पंचवर्षीय योजना तैयार किया था। इस योजना में ढाका की आर्थिक परियोजनाएं शामिल थीं। पूरे क्षेत्र को विकसित करने पर सहमति बनी थी। हसीना शेख ने नई दिल्ली को इस बारे में कई बार याद दिलाया है। लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी है। भारत के पास इसके बचाव में सिर्फ एक बात थी कि बांग्लादेश होकर अपने पूर्वोत्तर रायों में पहुंचने की सुविधा नहीं मिली है। शेख हसीना ने बहुत पहले ही यह सुविधा भी उपलब्ध करा दी।
बांग्लादेश में सत्तापलट की नाकाम कोशिश नई दिल्ली के लिए न सिर्फ एक चेतावनी है बल्कि एक अवसर भी है। भारत को बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार से असंतुष्ट लोगों के खिलाफ सख्ती से पेश आना चाहिए और यह साबित करना चाहिए कि जरूरत के वक्त वह किसी भी हद तक जाकर बांग्लादेश की मदद कर सकता है। साथ ही भारत को बांग्लादेश के साथ दोस्ती और मजबूत करनी चाहिए। लेकिन अब तक इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने असम की कुछ जमीन बांग्लादेश को दे दी है। बांग्लादेश ही जमीन का वास्तविक हकदार था। प्रधानमंत्री को अपने इस निर्णय को वैध बनाने के लिए लेकर संसद के अगले सत्र में संविधान संशोधन विधेयक लाना चाहिए। भाजपा और असम की कुछ ताकतें इस हस्तांतरण के विरोध में है। लेकिन उन्हें इस सच्चाई को समझना चाहिए कि संबंधित क्षेत्र बांग्लादेश का ही है और गलत तरीके से पिछले 40 सालों से यह भारत में था। बांग्लादेश की लगातार यह शिकायत रही है कि अगर भूलवश भी कोई बांग्लादेशी भारत की सीमा में पहुंच जाता है तो सीमा बल उसके साथ बहुत क्रूरता के साथ पेश आती है। सीमा बल बांग्लादेशियों के प्रति बहुत ही क्रूर है। पिछले दिनों एक बच्चा भूल से भारत की सीमा में आ गया था। उसे सीमा पुलिस किस निर्ममता के साथ पीट रही थी, यह टीवी चैनलों पर दिखाया गया।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बांग्लादेश जाने की सलाह दी जानी चाहिए। वे वहां काफी लोकप्रिय हैं लेकिन कुछ सप्ताह पहले हुई प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यात्रा में जो टीम ढाका गई थी, उसमें ममता बनर्जी नहीं थीं। इस कारण भी ममता को बांग्लादेश का दौरा कर वहां के लोगों की उम्मीदों को पूरा करना चाहिए। अगर ममता बांग्लादेश को तीस्ता नदी से कुछ अधिक पानी बांग्लादेश को देने की घोषणा कर देती हैं, तो पूरा बांग्लादेश उनके जयगान में नाचने लगेगा। इस सिलसिले में उन्हें पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री योति बसु से सीख लेनी चाहिए। बसु ने फरक्का बराज के पानी का हक बांग्लादेश को भी दिया था।
शेख हसीना ने न सिर्फ बांग्लादेश के सृजन का विरोध करने वालों, बल्कि उस युध्द में राष्ट्रविरोधी तत्वों की गतिविधियों में साथ देने वालों से निपटने का बड़ा काम किया है। उन लोगों ने घनघोर अत्याचार किया था, जो किसी से छुपा नहीं है। प्रतिभाशाली नौजवान लड़कों और लड़कियों को घिनौने तरीके से मार डाला गया था। यही हत्यारे या उनका साथ देने वाले शेख हसीना के खिलाफ सत्ता पलट की कोशिश में जुटे हुए थे। इस कोशिश को नाकाम करने के बाद सेना के बयान में जब कहा गया कि 'वैसे जघन्य अपराध को नाकाम कर दिया गया है', तो इसका मतलब हुआ कि शेख हसीना को पहले भी ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा था। यह चिंता का विषय है।
पूर्व रक्षा अधिकारियों व बिल्डरों के घर सीबीआई के छापे (04:16:35 AM) 01, Feb, 2012, Wednesday
| पूर्व रक्षा अधिकारियों व बिल्डरों के घर सीबीआई के छापे |
| (04:16:35 AM) 01, Feb, 2012, Wednesday मुम्बईपुणे ! भूमि हड़पने के एक मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने मंगलवार को सेना व रक्षा विभाग के दो अधिकारियों तथा एक बिल्डर के पुणे स्थित आवासों व दफ्तरों पर छापेमारी की। छापेमारी के दौरान कई तथ्यात्मक दस्तावेज बरामद हुए। इस महीने की शुरुआत में सीबीआई ने केंद्रीय आयुध डिपो के स्वामित्व वाला एक भूखंड अवैध तरीके से कल्पतरु बिल्डर्स को हस्तांतरित किए जाने का मामला दर्ज कर प्रारंभिक जांच शुरू की थी। इस मामले के सिलसिले में सीबीआई ने दक्षिणी सेना कमांडर के रूप में सेवा दे चुके लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) नोबले थम्बुराज और पूर्व रक्षा भूसंपदा अधिकारी (पुणे अंचल) एस.आर. नय्यर के आवासों तथा कल्पतरु बिल्डर्स के दफ्तरों पर तलाशी ली। सीबीआई ने यह कार्रवाई आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और आपराधिक कदाचार की दर्ज शिकायत के आधार पर की। सीबीआई के एक आधिकारी ने कहा, ''रक्षा मंत्रालय ने इस शिकायत की जांच सबीआई को सौंपी थी। थम्बुराज और नय्यर ने पुणे छावनी स्थित 0.96 एकड़ बी-3 रक्षा भूमि कल्पतरु बिल्डर्स को हस्तांतरित कर दी जिस पर लोथियन रोड में बंगला संख्या 8ए बनाई गई।'' उन्होंने कहा, ''थम्बुराज और नय्यर ने सरकारी पद पर रहते हुए सेना के पक्ष में अदालत के आदेश के बावजूद सांठगांठ कर यह सौदेबाजी की।'' अधिकारी ने कहा कि इन अधिकारियों ने नियम और नीतियों को नजरअंदाज किया तथा पट्टे की शर्त का उल्लंघन कर कल्पतरु को आर्थिक लाभ पहुंचाया। 46 करोड़ रुपये की इस सौदेबाजी में कोई जनहित नहीं था। |
नंगेपांव 156 किलोमीटर दौड़ बनाया कीर्तिमान (04:07:38 AM) 01, Feb, 2012, Wednesday
| नंगेपांव 156 किलोमीटर दौड़ बनाया कीर्तिमान |
| (04:07:38 AM) 01, Feb, 2012, Wednesday गुवाहाटी ! असम पुलिस के एक कांस्टेबल ने नंगेपांव मात्र 24 घंटे में 156.2 किलोमीटर की दूरी तय कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। इस कामयाबी के लिए उसका नाम गिनीज बुक आफ बुक रिकाड्र्स में शामिल किया जाएगा। यह कामयाबी हासिल की है ऊपरी असम के जोरहट कस्बे के अभिजीत बरुआ (22) ने। अभिजीत सोमवार सुबह 3.56 बजे जोरहट से दौड़ना शुरू किया और उसकी दौड़ मंगलवार शाम 3.56 बजे जोरहट में पूरी हुई। गिनीज वर्ल्ड रिकाड्र्स के भारतीय प्रतिनिधि चंद्रशेखर तिवारी ने कहा कि बरुआ ने नंगे पांव दुनिया की सर्वाधिक लम्बी दूरी तय की है। उन्होंने कहा, ''मैं इस पूरी दौड़ का वीडियो सहित सभी रिपोर्ट कार्यालय भेजने जा रहा हूं ताकि अंतिम निर्णय लिया जा सके।'' ज्ञात हो कि बरुआ की इस दौड़ की रिपोर्ट तैयार करने में जिले के सैकड़ों अधिकारी शामिल हुए। बरुआ ने अपनी दौड़ के दौरान केवल पानी और तरल भोजन लिया। कराटे और किकबॉक्सिंग में ब्लैक बेल्ट धारक बरुआ ने पिछले साल 28 मई को 26 घंटे एवं 31 मिनट में 150 किलोमीटर की दौड़ पूरी कर लिम्का बुक आफ रिकाड्र्स में अपना नाम शामिल कराने की कोशिश की थी। |
कोयले की कीमत में बढ़ोतरी वापस, इस्पात उद्योग को राहत मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवंस विश्वास
मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवंस विश्वास
कोयले की कीमत में बढ़ोतरी वापसी के कोलइंडिया के फैसले से इस्पात उद्योग को राहत मिली है।कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) ने नए मूल्य निर्धारण फॉर्मूले के आधार पर कोयले की कीमत में बढ़ोतरी वापस ले ली है, जो एक जनवरी से प्रभावी थी। बिजली, इस्पात और सीमेंट कंपनियों ने इस मूल्य वृद्धि का भारी विरोध किया था।
सीआईएल के अध्यक्ष एन सी झा ने नई दिल्ली में कहा कि कंपनी कोयले की कीमत अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुरूप नहीं रखेगी जिससे विभिन्न श्रेणी के कोयले की कीमत घट जाएगी। उन्होंने कहा कि मूल्य वृद्धि वापसी की घोषणा मंगलवार को की गई और यह एक फरवरी से प्रभावी होगी।
सीआईएल मार्च के बाद इस प्रणाली की समीक्षा करेगी। हालांकि उन्होंने साफ किया की जीसीवी आधारित कोयले की श्रेणी तय करना जारी रहेगा और मंगलवार के फैसले के बाद मूल्य की गड़बड़ी दूर हो जाएगी।
एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा नई मूल्य निर्धारण प्रणाली का राजस्व पर असर नहीं होगा और मंगलवार को हुई कटौती की समीक्षा मार्च के बाद की जाएगी। सीआईएल ने एक जनवरी से नई मूल्य निर्धारण प्रणाली अपनाई थी। इस प्रणाली के तहत मूल्य कोयले की ऊर्जा या गुणवत्ता से जुड़ी है।
सरकार के नए मूल्य निर्धारण फॉर्मूले पर बिजली उद्योग की अगुआई में घरेलू कोयला उपभोक्ताओं के कड़े विरोध को देखते हुए कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) को कोयले की कीमतों में बढ़ोतरी का निर्णय वापस लेना पड़ा। कोल इंडिया ने कोयले की गुणवत्ता के आधार पर 1 जनवरी से नई दरें लागू की थीं। कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने आज कहा कि बिजली कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका को देखते हुए कीमतों में बढ़ोतरी का निर्णय वापस लिया गया है।
कीमतों को वापस लिए जाने से जहां उपभोक्ताओं ने राहत की सांस ली है वहीं कोल इंडिया के राजस्व पर असर पडऩे की आशंका है। यही नहीं कंपनी ने आज श्रमिकों के साथ वेतन वृद्घि का करार भी किया है जिससे कोल इंडिया पर 6,500 करोड़ रुपये सालाना बोझ बढ़ेगा।
नए फॉर्मूले के तहत कोयले की कीमतों में औसतन 12.5 फीसदी बढ़ोतरी की गई थी, जिससे कोल इंडिया को सालाना करीब 6,250 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आमदनी होने की उम्मीद थी। कीमतों में वापसी की घोषणा के बाद मंगलवार को कोल इंडिया का शेयर बंबई स्टॉक एक्सचेंज पर सोमवार के मुकाबले 2.9 फीसदी गिरकर 325.6 रुपये पर बंद हुआ।
सीआईएल के चेयरमैन एन सी झा ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, 'नई नीति के तहत कीमतों में बढ़ोतरी वापस ले ली गई है। लेकिन इससे चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि नई कीमत निर्धारण प्रणाली की समीक्षा तीन माह बाद की जाएगी, उसके बाद ही इस बारे में कुछ कहा जा सकता है।' झा ने यह भी कहा कि कीमतों में वापसी से कोल इंडिया की सहायक इकाइयों के राजस्व का नुकसान हो सकता है लेकिन कोल इंडिया की कुल आय पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। कोल इंडिया ने एक माह पहले ही अंतरराष्ट्रीय मानक के तहत कोयले की कीमत तय करने के लिए कीमत निर्धारण की पुरानी प्रणाली की जगह नई नीति शुरू करने का निर्णय किया था।
ऊर्जा उत्पादक कंपनी एनटीपीसी लिमिटेड ने हाल ही में कहा था कि नई प्रणाली के तहत कीमतें तय करने से कंपनी की लागत में करीब 40 फीसदी का इजाफा हो सकता है। हालांकि कोयला मंत्रालय ने एनटीपीसी की बात को खारिज करते हुए कहा था कि नई नीति मुनाफे के लिए नहीं अपनाई गई है। उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं की ओर से खराब गुणवत्ता के कोयले की आपूर्ति की शिकायत मिलने के बाद इस तरह की नीति अपनाने पर विचार किया गया था।
पुरानी नीति (यूएचपी) के तहत घरेलू कोयले को राख और वाष्प को हटाने के बादा तापीय मूल्य के आधार पर सात श्रेणियों (ए से एफ) में बांटा जाता था। बिजली कंपनियां ज्यादातर ई और एफ श्रेणी के कोयले का इस्तेमाल करती हैं। निम्नतम श्रेणी एफ में तापीय मूल्य 2,400 किलो कैलोरी से 3,600 किलो कैलोरी प्रति किलोग्राम होती है, जिसकी कीमत 570 रुपये प्रति टन थी। सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले ए ग्रेड कोयले में प्रति किलोग्राम 6,200 किलो कैलोरी पाई जाती है, जो 4,100 रुपये प्रति टन के भाव बिकता है।
बिजली उद्योग ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल के साथ 18 जनवरी को हुई बैठक में कोयले की कीमतों की नई नीति का मसला उठाया था। बैठक के बाद जायसवाल ने बिजली उद्योग को आश्वासन दिया था कि कीमतों में अव्यावहारिक तरीके से बढ़ोतरी नहीं की जाएगी।
नई नीति के तहत कोयले को तापजनक मूल्य के हिसाब से 17 बैंड में बांटा गया था। निम्नतम श्रेणी के कोयले में प्रति किलो 2,200 से 2,500 किलो कैलोरी ऊर्जा का अनुमान जताया गया, जिसकी कीमत 480 रुपये प्रति टन तय की गई थी। सर्वोत्तम बैंड के कोयले की कीमत 4,900 रुपये प्रति टन आंकी गई। झा ने कहा, 'बैंड तय करने के पीछे मकसद यह था कि ग्राहकों को उनकी कीमत के मुताबिक गुणवत्ता वाले कोयले की आपूर्ति हो।'
पर अभी इंडोनेशिया से आयात हो रहे कोयले पर 7.55 फीसदी और दूसरे देशों से मंगाए जा रहे कोयले पर 10.83 फीसदी सीमा शुल्क का प्रावधान है। इसके अलावा पांच फीसदी प्रतिकारी शुल्क भी लगाया जाता है। उन्होंने कहा कि भारी भरकम कर लगने की वजह से कोयला आधारित परियोजनाएं प्रभावित हो रही हैं। उच्च बिजली दर का प्रभाव सभी वस्तुओं और सेवा क्षेत्र पर है जबकि बिजली परियोजनाओं में निवेश भी घटता जा रहा है।
उद्योग जगत ने सरकार से देश में ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आयातित कोयले पर सीमा शुल्क कम करने की मांग की है। विदेशी स्टीम कोयले पर तमाम तरह के कर लगने कारण देश में बिजली की कीमत 25 पैसे प्रति यूनिट तक महंगी हो जाती है। इसी के मद्देनजर उद्योग संगठन एसोचैम ने कोयले पर से सीमा शुल्क हटाने का सुझाव वित्त मंत्रालय को दिया है।
इस बीच केंद्र सरकार द्वारा सिंगल ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश की बाध्यता समाप्त किए जाने के बावजूद स्टारबक्स ने टाटा ग्लोबल के साथ पार्टनरशिप का विकल्प चुना है।स्टारबक्स कार्प देश में टाटा ग्लोबल बैवरेजेज के साथ मिलकर अपने आउटलेट्स खोलेगा। इसके लिए दोनों कंपनियों में एक संयुक्त उद्यम के लिए कारोबारी समझौता हुआ है। स्टारबक्स इस साल अगस्त या सितंबर तक अपना पहला कैफे शुरू कर देगा। साल के अंत तक कंपनी की योजना देश में 50 स्टोर का परिचालन शुरू करने की है।
समझौते के मुताबिक कंपनी टाटा ग्लोबल से कॉफी भारत से खरीदेगी और देश भर में खुदरा आउटलेट्स खोलेगी। दोनों कंपनियों में करीब एक साल पहले इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। स्टारबक्स और टाटा ग्लोबल का कहना है कि उन्होंने देश कैफे के परिचालन और कारोबार विस्तार के लिए बराबर की हिस्सेदारी वाला संयुक्त उद्यम टाटा स्टारबक्स लिमिटेड बनाया है। यह संयुक्त उद्यम देशभर में स्टारबक्स के आउटलेट्स स्थापित करेगा, जिसकी शुरुआत दिल्ली और मुंबई से की जाएगी।
टाटा ग्लोबल की इकाई टाटा कैफे ने कहा है कि उसने संयुक्त उद्यम को कॉफी की आपूर्ति के लिए एक करार पर दस्तखत किया है। मालूम हो कि भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक है, जो फिलहाल अपना 70 से 80 फीसदी उत्पादन निर्यात कर देता है।
ग्लोबल स्तर पर कमजोरी और स्थानीय स्तर पर हुई मुनाफावसूली से घरेलू शेयर बाजार पिछले छह कारोबारी सत्रों की तेजी खोकर सोमवार को दो फीसदी से अधिक की गिरावट लेकर बंद हुए। बीएसई का सेंसेक्स 371 अंक टूटकर 17 हजार के नीचे 16,863.30 पर और एनएसई का निफ्टी 117 अंक धराशाई होकर 5,087.30 अंक पर बंद हुआ।
बीएसई समूह में सभी वर्ग सूचकांक लाल निशान पर रहे। कैपिटल गुड्स, पावर, रीयल्टी, मेटल व बैंकिंग वर्ग के शेयरों में भारी मुनाफावसूली हुई। बीएसई का मिडकैप 115.38 अंक गिरकर 5,756.98 पर और स्मॉलकैप 118.10 अंक नीचे 6,373.59 अंक पर बंद हुआ। यूरो संकट के समाधान को लेकर संशय की स्थिति बने रहने से विदेशी बाजारों में चौतरफा गिरावट देखी गई। अमेरिका, यूरोप और एशियाई बाजार सभी नीचे रहे।
सेंसेक्स शुरुआती कारोबार में ही 130 अंक से ज्यादा की गिरावट लेकर 17,136.04 अंक पर खुला। बीच सत्र में 17,138.04 अंक के ऊपर और 16,828.33 अंक के निचले स्तर पर रहा। आखिर में 370.68 अंक यानी 2.15 प्रतिशत की गिरावट लेकर 16,863.30 अंक पर बंद हुआ। पिछले सप्ताह यह 17,233.98 अंक पर रहा था। निफ्टी ने भी करीब 35 अंक की गिरावट के साथ 5,163.55 अंक पर शुरुआत की। बीच सत्र में यह 5,166.15 अंक के उच्चतम और 5,076.70 के न्यूनतम स्तर पर रहकर अंत में 117.40 अंक घटकर 5,087.30 अंक पर सिमटा।
यूरोप में कर्ज संकट की समस्या गंभीर बनी हुई है। पिछले छह सत्रों से लिवाल रहे विदेशी संस्थागत निवेशक घरेलू बाजार में सोमवार को सतर्क नजर आए। उधर, घरेलू निवेशकों ने मुनाफावसूली की, जिससे सूचकांक दबाव में रहे। सेंसेक्स में भेल के शेयर 10.41 प्रतिशत घाटे के साथ सबसे ज्यादा नुकसान में रहे। स्टरलाइट के शेयर 5.99 प्रतिशत फिसले।
एलएंडटी 5.37 प्रतिशत व हिंडाल्को 4.81 प्रतिशत नुकसान में रही। इसके अलावा, घाटा उठाने वाली अन्य कंपनियों में महिंद्रा 4.71 प्रतिशत, एयरटेल 4.54, आईसीआईसीआई बैंक 4.07, टाटा स्टील 3.55, डीएलएफ 3.07, आरआईएल 2.71, एसबीआई 2.54, टाटा मोटर्स 2.42, हिंदुस्तान यूनि 1.99, विप्रो 1.96, टाटा पावर 1.62, एचडीएफसी 1.50, कोल इंडिया 1.41, गेल इंडिया 1.18, मारुति 1.16, एनटीपीसी 1.01, एचडीएफसी बैंक 0.94, ओएनजीसी 0.92, सिप्ला 0.59, इनफोसिस 0.54 और आईटीसी 0.54 प्रतिशत घाटे के साथ शामिल रही। लाभ में रहने वाली कंपनियों में सन फार्मा 1.34, बजाज ऑटो 0.48, जिंदल स्टील 0.41, हीरो मोटोकार्प 0.13 और टीसीएस 0.06 प्रतिशत मुनाफे में रही।
Palash Biswas
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उद्योग जगत से बुरी खबरों के आने का सिलसिला जारी है। दिसंबर महीने में कोर इंडस्ट्रीज ने सिर्फ 3 फीसदी की ही ग्रोथ दर्ज की है, जो पिछले साल के दिसंबर के मुकाबले आधे से भी कम है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अमेरिका की संरक्षणवादी नीति की आलोचना की है।
उद्योग जगत से बुरी खबरों के आने का सिलसिला जारी है। दिसंबर महीने में कोर इंडस्ट्रीज ने सिर्फ 3 फीसदी की ही ग्रोथ दर्ज की है, जो पिछले साल के दिसंबर के मुकाबले आधे से भी कम है।
वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने अमेरिका की संरक्षणवादी नीति की आलोचना की है।
मुंबई से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
उद्योग जगत से बुरी खबरों के आने का सिलसिला जारी है। दिसंबर महीने में कोर इंडस्ट्रीज ने सिर्फ 3 फीसदी की ही ग्रोथ दर्ज की है, जो पिछले साल के दिसंबर के मुकाबले आधे से भी कम है।सरकार ने वित्त वर्ष 2010-11 की आर्थिक विकास दर का अनुमान घटाकर 8.4 फीसदी कर दिया जो पहले 8.5 फीसदी था। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी आर्थिक विकास के फौरी अनुमान में कहा गया, 'जीडीपी ने स्थिर मूल्य पर 2010-11 के दौरान 8.4 फीसदी का विकास दर दर्ज की।' वित्त वर्ष 2010-11 में विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र के विकास की दर 7.2 फीसदी रही। इसके अलावा वित्त वर्ष 2009-10 में जीडीपी की विकास दर को संशोधित कर 8.4 फीसदी कर दिया गया जबकि पिछला अनुमान आठ फीसदी का था। आंकड़े के मुताबिक कृषि क्षेत्र की विकास दर 2010-11 में 7 फीसदी रही जो 2009-10 में सिर्फ एक फीसदी थी। वित्त, बीमा, रीयल एस्टेट और कारोबारी सेवा ने 2010-11 में 10.4 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की थी जबकि पिछले वित्त वर्ष के दौरान 9.4 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की थी। ग्लोबल मंदी, घरेलू स्तर पर ऊंची ब्याज दर और अन्य कारकों के कारण इस महीने रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी की विकास दर का अनुमान घटाकर 7 फीसदी कर दिया जबकि इससे पहले 7.6 फीसदी का अनुमान जाहिर किया था।
दिसंबर 2010 में कोर सेक्टर की ग्रोथ 6.3 फीसदी रही थी। कोर सेक्टर में कोयला, सीमेंट, नैचुरल गैस, पेट्रोलियम रिफाइनरी और फर्टिलाइजर इंडस्ट्रीज होती हैं। यह साल 2011-12 की दूसरी सबसे कम ग्रोथ है।
इसके पहले अक्टूबर में कोर सेक्टर ने सिर्फ 0.3 फीसदी की ही ग्रोथ दिखाई थी। कोर सेक्टर ग्रोथ के ये आंकड़े इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में करीब 38 फीसदी का योगदान करते हैं। जिसका संकेत यह है कि दिसंबर के आईआईपी के आंकड़ों से भी बाजार को निराशा हाथ लग सकती है।
दूसरी ओर बाजार में खरीदारी जारी है और सेंसेक्स-निफ्टी 1 फीसदी से ज्यादा चढ़े हैं। सेंसेक्स 193 अंक चढ़कर 17057 और निफ्टी 59 अंक चढ़कर 5146 के स्तर पर हैं।
बैंक शेयरों में तेजी बढ़कर 2 फीसदी हो गई है। आईटी, ऑयल एंड गैस, तकनीकी, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स शेयर 1.5-1 फीसदी तेज हैं। ऑटो, एफएमसीजी और सरकारी कंपनियों के शेयर 0.75 फीसदी चढ़े हैं। पावर शेयरों में मामूली बढ़त है।
आईसीआईसीआई बैंक, बजाज ऑटो, एसबीआई, रिलायंस इंडस्ट्रीज, टीसीएस, जिंदल स्टील, डीएलएफ, आईटीसी, इंफोसिस, एचडीएफसी बैंक, बीएचईएल, टाटा मोटर्स, एचडीएफसी, ओएनजीसी, एमएंडएम 3-1 फीसदी चढ़े हैं।
हेल्थकेयर और मेटल शेयरों ने तेजी गंवा दी है। कैपिटल गुड्स शेयर 0.75 फीसदी गिरे हैं। टाटा स्टील, एलएंडटी, मारुति सुजुकी, कोल इंडिया, एनटीपीसी, एचयूएल 1.5-0.5 फीसदी कमजोर हैं।
भारत ने आउटसोर्सिंग बंद करने को लेकर अमेरिका को चेतावनी दी है। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सोमवार को कहा कि अगर अमेरिका आउटसोर्सिंग बंद करता है, तो घाटा उसे भी होगा। वित्त मंत्री ने अमेरिका की संरक्षणवादी नीति की आलोचना की है। प्रणव मुखर्जी का कहना है कि आउटसोर्सिंग पर रोक लगाने से दोनों देशों की अर्थव्यस्था प्रभावित होगी। मुखर्जी ने शिकागो में संवाददाताओं से कहा कि देश अपनी जरूरतों के मुताबिक नीतियां अपनाने के लिए आजाद हैं, लेकिन ये संरक्षणवाद की ओर ले जाने वाली नहीं होनी चाहिए।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने देश की अर्थव्यवस्था का एक ऐसा खाका पेश किया है जिसके तहत अमेरिका को आउटसोर्सिंग, खराब कर्ज और कृत्रिम मुनाफे से दूर ले जाया जाएगा।अमेरिकी राष्ट्रपति ने आउटसोर्सिंग के खिलाफ अपने अभियान को तेज करते हुए उन कंपनियों को रियायतें बंद करने के लिए उपायों की घोषणा की है जो देश के बाहर नौकरियां दे रही हैं। इस कदम से भारत में भी कंपनियां प्रभावित होंगी।
वित्त मंत्री के मुताबिक अगर अमेरिका भारत से आउटसोर्सिंग रोकता है तो इससे उसकी कंपनियों के मुनाफे पर भी असर पड़ेगा। हालांकि उन्होंने ये जरूर कहा कि किसी भी देश को अपने जरूरतों की हिसाब से नीति तय करने की आजादी है लेकिन वो संरक्षणवादी नहीं होनी चाहिए।
प्रणव मुखर्जी ने वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन का हवाला देते हुए कहा कि उसका पूरा जोर दुनिया भर के बाजार खोलना है और ऐसे में किसी भी देश को संरक्षणवादी नीति से बचना चाहिए।उन्होंने कहा, डब्ल्यूटीओ भी दुनिया भर में वस्तुओं और सेवाओं के मुक्त आदान-प्रदान की दिशा में काम कर रहा है।
दरअसल कुछ दिन पहले ही अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि जो कंपनियां अमेरिकी लोगों को ज्यादा नौकरियां देंगी उन्हें टैक्स छूट दी जाएगी। जबकि आउटसोर्सिंग करने वाली कंपनियों को ज्यादा टैक्स चुकाना पड़ेगा।
इन्फर्मेशन टेक्नॉलजी (आईटी) सेक्टर में ट्रेन्ड ग्रेजुएट्स के बीच बेरोजगारों की बढ़ती संख्या ने उद्योग जगत के नेताओं को मांग और पूर्ति के फासले को मिटाने के लिए विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।
कारोबारियों का मानना है कि पिछले कुछ सालों में यह स्थिति और भी खराब हुई है इसके बावजूद उद्योग जगत और शैक्षणिक संस्थानों के बीच व्यापक स्तर पर चर्चा की नियमित परंपरा का विकास नहीं हो पाया है। इस स्थिति को देखते हुए बेंगलुरु चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (बीसीआईसी) शैक्षणिक संस्थानों और आईटी कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल के लिए एक कार्यबल बनाने पर विचार कर रहा है। यह बात बीसीआईसी के सीनियर अधिकारी ने कही। शैक्षणिक संस्थानों और कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल से पाठ्यक्रमों में जरूरी संशोधन किया जा सकता है, ताकि ग्रेजुएट्स को उन सभी जरूरी कौशल से लैस किया जा सके, जिसकी दरकार कंपनियों को होती है।
बीसीआईसी द्वारा इस माह के शुरू में बेंगलुरु में आयोजित शिक्षा संस्थानों और कारोबारी कंपनियों के प्रतिनिधियों के एक सम्मेलन में कार्यबल का विचार सामने आया। बीसीआईसी के मुताबिक सम्मेलन को बेंगलुरु में कराने का कारण यह है कि यह देश का आईटी हब है और इस सेक्टर में यहां लगभग आठ लाख प्रफेशनल काम कर रहे हैं।
इस बीच भारत को निवेशकों के लिए असीम संभावनाओं वाला देश बताते हुए हिन्दूजा ग्रुप के को-प्रेजिडेंट जी. पी. हिन्दूजा ने कहा है कि पश्चिमी दुनिया की कंपनियों को भारत और चीन सहित उभरते बाजारों में प्रवेश करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस तरह के निवेश से दोनों पक्षों की अर्थव्यवस्थाओं को सुधारने में मदद मिलेगी।
हिन्दूजा ने दावोस में हाल में सम्पन्न ग्लोबल इकॉनमी फोरम (डब्ल्यूईएफ) की बैठक के दौरान कहा कि पश्चिमी देशों को अपनी अर्थव्यवस्था की गति को सुधारने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। उन्हें उभरते बाजारों में प्रवेश करना चाहिए। भारत, ब्राजील और अफ्रीकी देशों में ग्रोथ की अच्छी संभावनाएं हैं और इसका दोतरफा असर होगा। उनकी यह टिप्पणी ऐसे वक्त में आई है जब यूरो संकट और पश्चिमी अर्थव्यवस्था की नरमी से वैश्विक अर्थव्यवस्था के पटरी से उतरने का खतरा दिख रहा है।
गौरतलब है कि दुनिया भर में हिन्दूजा ग्रुप की कंपनियों में 40 , 000 लोग कार्यरत हैं। कंपनी की भारत में भी अलग-अलग क्षेत्रों में अच्छी उपस्थिति है। भारत के व्यवसाय के बारे में हिन्दूजा ने कहा कि भारत में कोई ऐसा व्यवसाय नहीं है जिसमें बढ़ोतरी नहीं हो रही है। कंपनी को भारत को लेकर कोई चिंता नहीं है।'
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