Thursday, September 8, 2016

राजद्रोह का राष्ट्र: आनंद तेलतुंबड़े


राजद्रोह का राष्ट्र: आनंद तेलतुंबड़े


कोई कार्रवाई सचमुच राजद्रोह है, या फिर इसके नाम पर किसी तरह से बोलने की आजादी को कुचलने की कोशिश हो रही है, इसकी पहचान के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने 'फौरन हिंसा' भड़काने की जो कसौटी रखी है, उस पर वो अपने फैसलों में बार-बार जोर देता रहा है जैसा कि एस. रंगराजन वगैरह बनाम पी. जगजीवन राम; इंद्र दास बनाम असम राज्य, और अरुप भुइंयां बनाम बनाम असम राज्य मामलों में देखा जा सकता है. इस संदर्भ में सबसे अहम फैसलों में से एक बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य है, जिसमें दो सिखों पर इंदिरा गांधी की हत्या के दिन खालिस्तान के पक्ष में और भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप लगाया गया था. नारे साफ तौर पर भारतीय सार्वभौमिकता और सरकार को कमजोर करते हैं, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपितों को बरी कर दिया क्योंकि उन्होंने फौरी तौर पर कोई हिंसा नहीं भड़काई थी. सर्वोच्च न्यायालय ने इसे साफ किया कि देश से अलग होने या हिंसक तरीके से सरकारों को उखाड़ फेंकने की हिमायत करना भी राजद्रोह के दायरे में नहीं आता, जब तक कि यह फौरी तौर पर हिंसा को उकसावा न देता हो.

राजद्रोह का राष्ट्र: आनंद तेलतुंबड़े


आनंद तेलतुंबड़े बता रहे हैं कि कैसे आलोचना और असहमति को कुचलने के लिए तथा बोलने की आजादी को खत्म करने के लिए राजद्रोह कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है. अनुवाद:रेयाज उल हक
धारा 124 ए... भारतीय दंड विधान की राजनीतिक धाराओं का शायद सरताज है, जिसे नागरिकों की आजादी को कुचलने के लिए बनाया गया है.
-महात्मा गांधी

राजद्रोह (जिसे गलत तरीके से और शायद जानबूझ कर देशद्रोह कहा जा रहा है) फिर से सुर्खियों में है. इस बार इसका आरोप एक समूचे संगठन पर लगा है. दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले एक अग्रणी एनजीओ की शाखा एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने 13 अगस्त को 'ब्रोकेन फेमिलीज़' नाम का एक सेमिनार आयोजित किया था. यह जम्मू और कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन का इंसाफ मांगने के अभियान का हिस्सा था. कार्यक्रम के दौरान जब पीड़ित अपनी आपबीती सुना रहे थे तो दक्षिणपंथी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सदस्यों ने विरोध करना शुरू किया. इसके बाद हुई कहासुनी में कुछ कश्मीरी छात्रों ने आजादी के पक्ष में नारे लगाए. एबीवीपी ने एक एफआईआर दर्ज कराया और बैंगलोर पुलिस को इसके लिए मजबूर किया कि वो एमनेस्टी इंडिया पर 'दुश्मनी को बढ़ावा देने' के आरोप में और धारा 124-ए के तहत मुकदमा दर्ज करे जिसमें अगर कसूर साबित हो गया तो आजीवन कैद की सजा हो सकती है. राज्य की कांग्रेस सरकार ने फजीहत से बचते हुए कहा कि वो जांच के बाद ही इस दिशा में कोई फैसला करेगी. इस बेमतलब के बयान के बावजूद, अगर नारे भारत-विरोधी और पाकिस्तान के पक्ष में थे, तब भी सरकार को यह पता होना चाहिए कि कानूनन यह राजद्रोह के दायरे में नहीं आता.

मौजूदा सत्ताधारी गिरोह द्वारा इस पुराने पड़ चुके कानून का जिस तरह गलत इस्तेमाल किया जा रहा है वो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की पूरी तरह अवमानना है. इसका मतलब हरेक असहमति को राजद्रोह बना देना है. इस गिरोह ने सरकार, राज्य, राष्ट्र और देश के बीच के फर्क को मिटा दिया है और वो खुद को राष्ट्रवाद और देशभक्ति का साकार रूप मानने लगा है, इसलिए जो कोई भी इसके सामने खड़ा होता है वो खुद ब खुद राजद्रोही बन जाता है. पिछले चुनावों में 69 फीसदी भारतीयों ने उनके पक्ष में वोट नहीं डाला था और उनके प्रति कुछ असहमति जाहिर की थी, और इस दलील के मुताबिक वे संभावित रूप से राजद्रोही हैं, और इस तरह यह दलील इस देश को राजद्रोही लोगों का एक राष्ट्र बना देती है.

औपनिवेशिक विरासत

 
धारा 124-ए का मसौदा मूल रूप से मैकाले के 1837-39 के ड्राफ्ट पीनल कोड (मसौदा दंड संहिता) में बनाया गया था, लेकिन 1860 में लागू हुई आईपीसी में से इसे हटा दिया गया था. इसको 1870 में भारतीय मीडिया, बुद्धिजीवियों और आजादी की लड़ाई लड़ने वालों की असहमत आवाजों को दबाने के लिए लागू किया गया. इसके सबसे शुरुआती मुकदमों में से एक 1891 में  बंगोबासी के संपादक जोगेंद्र चंद्र बोस का मुकदमा था, जो एज ऑफ कॉन्सेंट बिल की आलोचना करने और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के नकारात्मक आर्थिक प्रभावों पर टिप्पणी करने के लिए उन पर चला था. इसके बाद अनेक मुकदमे चले, सजाएं हुईं. लोकमान्य तिलक को इस अधिनियम के तहत 1897 में कसूरवार ठहराया गया लेकिन उन्हें 1898 में मैक्स वेबर जैसी अंतरराष्ट्रीय रूप से मशहूर शख्सियत के दखल के साथ इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि ऐसा कुछ नहीं करेंगे, न लिखेंगे और न बोलेंगे जिससे सरकार के प्रति नाखुशी को बढ़ावा मिलता हो. यह कानून 'नाखुशी' (disaffection) की अजीबोगरीब बात की ओट में सरकार के प्रति वफादारी की मांग करती है, जिसको तिलक के खिलाफ मुकदमे के दौरान परिभाषित करते हुए जज ने बताया था कि नाखुशी का मतलब मतलब सरकार के प्रति 'प्यार की कमी' है. आगे चल कर इसका शिकार बने गांधी ने इसकी साफ-साफ आलोचना करते हुए कहा था, 'कानून के जरिए आप प्यार नहीं जगा सकते और न इसको अपनी मर्जी से चला सकते हैं. अगर किसी को किसी इंसान से प्यार नहीं है, तो उसे अपनी नाखुशी को जाहिर करने की इसकी पूरी आजादी होनी चाहिए, बशर्ते वो हिंसक तरीके नहीं अपनाता और इसके लिए लोगों को प्रोत्साहित करने और भड़काने नहीं लग जाता.' आगे चल कर गांधी राष्ट्रपिता बने और भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य बना, लेकिन यह कठोर औपनिवेशिक कानून, बल्कि पूरा का पूरा आईपीसी ही अच्छे लगने वाले जुमलों और बातों के संवैधानिक मुलम्मे के साथ जस का तस अपना लिया गया.

संविधान सभा में राजद्रोह को हटाने के लिए एक संशोधन पेश किया गया था, लेकिन के.एम. मुंशी की दखल ने इसे बचा लिया, जिनकी दलील थी कि सरकार की आलोचना और सुरक्षा और व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले उकसावे के बीच में फर्क किया जा सकता है. पहले संविधान संशोधन के वक्त प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने साफ साफ कहा था कि राजद्रोह कानून बुनियादी तौर पर असंवैधानिक है. इसके बावजूद राजद्रोह कानून कानून की किताब में बना रहा और केंद्र और राज्य सरकारें बार-बार इसका इस्तेमाल राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए करती रहीं. इस कानून को पहली बड़ी संवैधानिक चुनौती पचास के दशक में मिली जब तारा सिंह गोपी चंद (1951), साबिर रजा (1955) और राम नंदन (1958) के तीन मामलों में इसे बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन करने के कारण रद्द कर दिया गया. पहले मामले में मुख्य न्यायाधीश एरिक वेस्टन ने लिखा, "भारत अब एक सार्वभौम लोकतांत्रिक राज्य है. ...विदेशी शासन के वक्त जरूरी माना गया राजद्रोह का कानून अब इस बदलाव की वजह से ही नामुनासिब हो गया है." बाद में राम नंदन के मामले में, जिनको खेतिहरों और मजदूरों को अपनी सेना बना कर सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए प्रोत्साहित करने के भड़काऊ भाषण का कसूरवार ठहराया गया था, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में धारा 124-ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई. अदालत ने राम नंदन को कसूरवार माने जाने को खारिज कर दिया और धारा 124-ए को असंवैधानिक घोषित किया.

कानून की वापसी
 

लेकिन 1962 में सर्वोच्च न्यायालय ने केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के मामले में इस फैसले को पलट दिया. केदार नाथ सिंह बिहार में फॉरवर्ड कम्युनिस्ट पार्टी के एक सदस्य थे, उन्होंने कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार, कालाबाजारी और तानाशाही का आरोप लगाया था और जमीन के फिर से बंटवारे की विनोबा भावे की कोशिशों को निशाना बनाया था. उन्होंने क्रांति की बात की थी, जो पूंजीपतियों, जमींदारों और कांग्रेस नेताओं को उखाड़ फेंकेगी. ट्रायल कोर्ट ने उन्हें आईपीसी की 124-ए और 505-बी के तहत कसूरवार ठहराया. उन्होंने इस फैसले के तहत अपील किया. पटना उच्च न्यायालय ने उनकी अपील को खारिज कर दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने राजद्रोह कानून की संवैधानिकता को तो कायम रखा, लेकिन इसे सिर्फ उन्हीं कार्रवाइयों में लागू किए जाने लायक बताया जिनमें कानून-व्यवस्था भंग किए जाने का रुझान मिलता है  या फिर जिनमें फौरन हिंसा भड़काई गई हो. जजों ने साफ-साफ यह कहा कि अगर राजद्रोह कानून की व्याख्या व्यापक हुई तो यह संवैधानिकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा. इसलिए अदालत ने अमेरिकी कानून की तर्ज पर राजद्रोह के मामलों को तय करने के लिए इस बात पर जोर दिया कि उस कार्रवाई का असर क्या था, न कि अपने आप में वह कार्रवाई क्या थी. इसने बहुत साफ-साफ कहा कि अगर 'लिखे या बोले गए शब्द, जिनसे सरकार के खिलाफ सिर्फ नाराजगी या दुश्मनी पैदा होती हो' के मामले में धारा 124-ए को लागू किया गया तो ऐसे में यह धारा संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के अधीन होगी. यह अनुच्छेद अन्य बातों के अलावा सभी नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति के, शांति पूर्ण रूप से जमा होने और संगठित होने के अधिकार देता है.

कोई कार्रवाई सचमुच राजद्रोह है, या फिर इसके नाम पर किसी तरह से बोलने की आजादी को कुचलने की कोशिश हो रही है, इसकी पहचान के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने 'फौरन हिंसा' भड़काने की जो कसौटी रखी है, उस पर वो अपने फैसलों में बार-बार जोर देता रहा है जैसा कि एस. रंगराजन वगैरह बनाम पी. जगजीवन राम; इंद्र दास बनाम असम राज्य, और अरुप भुइंयां बनाम बनाम असम राज्य मामलों में देखा जा सकता है. इस संदर्भ में सबसे अहम फैसलों में से एक बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य है, जिसमें दो सिखों पर इंदिरा गांधी की हत्या के दिन खालिस्तान के पक्ष में और भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप लगाया गया था. नारे साफ तौर पर भारतीय सार्वभौमिकता और सरकार को कमजोर करते हैं, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपितों को बरी कर दिया क्योंकि उन्होंने फौरी तौर पर कोई हिंसा नहीं भड़काई थी. सर्वोच्च न्यायालय ने इसे साफ किया कि देश से अलग होने या हिंसक तरीके से सरकारों को उखाड़ फेंकने की हिमायत करना भी राजद्रोह के दायरे में नहीं आता, जब तक कि यह फौरी तौर पर हिंसा को उकसावा न देता हो.

कानून का राज कहां है

कानून भले ही ऐसा हो, लेकिन सरकारें इसे राजनीतिक असहमति को कुचलने या फिर लोगों को काबू में करने की खातिर उन्हें आतंकित करने के लिए इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल करती रही हैं. बदकिस्मती ये है कि अरुंधति रॉय, एसएआर गीलानी, डॉ. बिनायक सेन और हाल ही में जेएनयू के छात्रों, तमिल लोक गायक कोवन, हार्दिक पटेल और असीम त्रिवेदी जैसे कुछ मशहूर मामले ही मीडिया में जगह बना पाते हैं. दिलचस्प बात ये है कि गीलानी और रॉय के मामले में राजद्रोह के मुकदमे पुलिस द्वारा नहीं बल्कि निचली अदालत द्वारा थोपे गए. कुछ कम जाने माने मामलों में शामिल है एक कश्मीरी स्कूली शिक्षक का मामला जिसको कश्मीर घाटी में अशांति से संबंधित सवाल वाला एक प्रश्न पत्र तैयार करने के लिए राजद्रोही बताया गया, दलित सामाजिक कार्यकर्ता और विद्रोही के संपादक सुधीर धवले को माओवादी संपर्कों के लिए गिरफ्तार किया गया, अहमदाबाद में द टाइम्स ऑफ इंडिया के स्थानीय संपादक भारत देसाई को अपने एक वरिष्ठ रिपोर्टर और फोटोग्राफर के साथ इस आरोप का सामना करना पड़ा, जिन्होंने पुलिस अधिकारियों की काबिलियत पर सवाल उठाए थे और उनके और माफिया के बीच रिश्तों का आरोप लगाया था; एक भारत-पाक क्रिकेट मैच के दौरान पाकिस्तान के लिए खुशी मनाने वाले कश्मीरी छात्रों पर इसका आरोप लगाया गया. लेकिन गरीब आदिवासियों, दलितों और मुसलमानों के ऐसे बेशुमार मामले हैं, जिन पर किसी की भी निगाह नहीं जाती.

एक तरफ जहां अवाम के हक में खड़े कार्यकर्ता और बुद्धिजीवियों को राजद्रोह के आरोपों में परेशान किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ असली अपराधियों को महान देशभक्त बताया जाता है. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राजद्रोह की जो परिभाषा दी गई है, उसकी सबसे अच्छी मिसाल 1992-93 में बंबई दंगों के पहले और उसके दौरान बाल ठाकरे के भाषण हैं, जिन्होंने श्रीकृष्णा आयोग के मुताबिक मुसलमानों की हत्याओं के लिए सीधे-सीधे उकसाया. उसके पहले भाजपा नेताओं द्वारा रथ यात्रा के दौरान और अयोध्या में 1992 में दिए गए भाषण हैं, जिनका अंजाम ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद की तबाही और खौफनाक सांप्रदायिक दंगे रहे. ये राजद्रोह के सटीक मामले हैं. खुद नरेंद्र मोदी द्वारा 2002 में दिए गए सांकेतिक बयान भी राजद्रोह की मिसाल हो सकते हैं, जो गुजरात में 2000 मुसलमानों के कत्लेआम की वजह बने. और बेशक साधुओं और साध्वियों और प्रवीण तोगड़िया और प्रमोद मुतलिक जैसों द्वारा लगातार जहर उगलना तो पक्के तौर पर राजद्रोह है, जो सीधे-सीधे मुसलमानों के खिलाफ हिंसा भड़काते हैं.

राजद्रोह के मामलों के इतिहास को देखें तो उनमें से शायद ही कोई अदालत में टिक पाता है, लेकिन पुलिस बेधड़क इसका इस्तेमाल करती जा रही है, जैसा कि एमनेस्टी के मौजूदा मामले में देखा गया है. इस मामले में विडंबना ये है कि सेमिनार में एबीवीपी की हरकत को राजद्रोही कहा जा सकता है, क्योंकि इसने सीधे-सीधे एक भीड़ को एमनेस्टी के दफ्तर पर हमला करने के लिए उकसाया और सार्वजनिक व्यवस्था को भंग किया, जबकि कश्मीरी छात्रों द्वारा लगाए गए आजादी के नारों से कुछ भी नहीं हुआ था. अनुभव के आधार पर साबित तथ्य यह है कि सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा तभी होता है जब एक प्रभावशाली इंसान, जो हरेक मामले में एक ऐसा राजनेता होता है जिसे राज्य का समर्थन हासिल होता है, कोई विवादास्पद बयान देता है. कार्यकर्ता भले ही लोगों को विद्रोह में उठ खड़े होने को उकसाएं, उन्हें जनता की तरफ से ऐसी कोई प्रतिक्रिया मुश्किल से ही मिलती है.

लेकिन फिर यह अधिनियम कानून का हिस्सा अभी तक क्यों बना हुआ है, जो लोकतंत्र के इतने अयोग्य है? हमारे भलेमानस जजों ने इसकी व्याख्या की है, लेकिन जिस भाषा में यह व्याख्या की गई है वह अभी भी पुलिस को इसके लिए एक पर्याप्त ओट देती है कि वह लोगों को परेशान करती रहे. और शासकों का मकसद ही यही है. संविधान की संरक्षक अदालतों को इस अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर देना चाहिए, क्योंकि यह संविधान की आत्मा को पूरी तरह से नकारता है. अगर जनता सार्वभौम है और उसने ही सरकार बनाई है, तो फिर जनता को ही कैसे राजद्रोही कहा जा सकता है? जिन चुने हुए प्रतिनिधियों पर भरोसा करते हुए जनता ने उन्हें सत्ता सौंपी है, अगर वो गलत आचरण करते हैं और इस भरोसे का उल्लंघन करते हुए अपनी सत्ता का गलत इस्तेमाल करते हैं, तो असल में राजद्रोह तो इसे होना चाहिए.

वक्त आ गया है कि हमारा सर्वोच्च न्यायालय इस कानून को और ऐसे ही दूसरे कठोर कानूनों को खत्म करे और हमें इस मजाक से राहत दिलाए.
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Wednesday, September 7, 2016

सिक्किम में कनक नदी में भागीरथी जैसी कृत्तिम झील,मूसलाधार बारिश से कहर बरपने का अंदेशा एक्सेकैलिबर स्टीवेंस विश्वास हस्तक्षेप संवाददाता

सिक्किम में कनक नदी में भागीरथी जैसी कृत्तिम झील,मूसलाधार बारिश से कहर बरपने का अंदेशा

एक्सेकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

हस्तक्षेप संवाददाता

सिक्किम में कनक नदी में कृत्रिम जलाशय के लिए वीडियो

गांतोक।1978 में गंगोत्री के ऊपर भागीरथी के उत्स में भूस्खलन से कृत्तिम झील बन जाने से आयी बाढ़ से बंगाल तक के बह जाने के हालात बन गये थे।गंगा के किनारे गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक उस तबाही के आलम के फिर हिमालय के दूसरे छोर पर करीब चार दशक बाद सिक्किम की कनक और तीस्ता नदियों के संगम के मुख पर बनी कृत्तिम झील के निर्माण से दोहराये जाने का अंदेशा है,इसका विध्वंसक असर सिक्किम में उतना न भी हो तो  सिक्किम से आने वाली तीस्ता जैसी नदियों के उफने जाने की हालत में उत्तर बंगाल के जनजातिबहुल तमाम इलाकों से लेकर बांग्लादेश तक कहर टूटने  की आशंका है।


मीडिया के मुताबिक सिक्किम में तीस्ता नदी की सहायक नदी कनक पर एक कृत्रिम झील बन जाने से निचले इलाकों पर अचानक बाढ़ आने का खतरा बढ़ गया है।150 फीट चौड़ी इस झील से सिक्किम के निचले इलाकों और उत्तरी बंगाल में खतरा बढ़ गया है।दरअसल गंगटोक से 70 किलोमीटर दूर जोंगू में भारी बारिश से पहाड़ का बहुत बड़ा हिस्सा नीचे बह रही कनका नदी में गिर गया।अचानक गिरे मलबे से कनक नदी ब्लॉक हो गई...और उसमें कृत्तिम  झील बन गयी..अब मुश्किल यह है कि इस झील में पानी लगातार जमा हो रहा है...और वक्त के साथ खतरा बढ़ता ही जा रहा है..


केंद्रीय जल आयोग  यानी सीडब्ल्यूसी ने पहाड़ों में भूस्खलन से की वजह से कनक नदी के रास्ते में रुकावट आने से झील के खतरे पर एक रपट तैयार की है।


इस रपट के मुताबिक, कनक नदी पर बनी कृत्रिम झील में बहुत भारी मात्रा में पानी जमा हो रहा है और इसपर बने अवरोध के फटने से कनक और तीस्ता नदी में पानी का स्तर बहुत तेजी से 4.5 मीटर से ऊपर तक चढ़ जाएगा


वैसे भी तिस्ता हमेशा बरसात में प्रलंयकर बन जाती है और अपने दोनों किनारों पर कगार तोड़कर कहर बरपाती है।उत्तर बंगाल में सालाना बाढ़ आम बात है और इस वक्त भी उत्र बंगाल बाढ़ के शिंकजे से कतई रिहा हुआ नहीं है।


पिछले तेरह अगस्त को हुए भूस्खलन से यह कृत्तिम जझील बनी है।भूस्खलन से सिक्किम के ऊंचे पहाड़ों के मध्य मंगन के पास नदी बंध गयी है और उसमें पाहड़ का हिस्सा गिरने से प्राकृतिक बांध जैसा बनकर कनक नदी का अबाध जलप्रवाहझील में तब्दील है और मूसलाधार बारिश से उसके कभी भी टूट जाने की आशंका है।


गांतोक में फिर भारी वर्षा की चेतावनी जारी कर दी गयी है और गांतोक में बैठे अंदाजा लगाना मुश्किल है कि आपदा प्रबंधन के लिए सिक्किम के बाहर खासकर उत्तर बंगाल में क्या एहतियाती इंतजाम किये जा रहे हैं।


गौरतलब है कि हाल के वर्षों में समुद्री तूफान से पहले मिली चेतावनी के बाद प्रभावित होने वाले इलाकों से जनसंख्या हटाने की कवायद कामयाब होते रहने की वजह से जान माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सका है।


बहरहाल समुद्री तूफान से प्रभावित होने वाले समुद्रतट के सीमित क्षेत्र से जनसंख्या को हटाना जितना सरल है,पहाडों और तराई के दुर्गम इलाकों में वह करना बेहद मुश्किल है।फिर बाढ़ की चपेट में कमोबेश पूरा देश है।


केदार जलप्रलय के अनुभव के मद्देनजर हुए मौसम भविष्यवाणी के मुताबिक देश में भारी वर्षा,भूस्खलन और बाढ़ से जान माल की हानि कम करने के लिहाज से समुद्री तूफान से निपटने की तर्ज पर अभी कुछ हुआ हो,ऐसी जानकारी नहीं मिली है।


बहरहाल सूखे से किसानों की कमर टूट जाने के बाद देश भर में अतिवृष्टि और बाढ़ का सिलसिला शुरु हो गया है।हर साल की तरह राहत और सहायता की तैयारी जितनी है,आपदा प्रबंधन की कवायद उस हिसाब से नहीं के बराबर है।केंद्र और राज्यों की राजनीति जितनी गरमा रही है,हकीकत की जमीन पर आपदा प्रभावितों की जान माल की परवाह उतनी नहीं है।


इस लिहाज से गांतोक,कोलकाता और दिल्ली या देश के किसी भी राजधानी क्षेत्र के मिजाज और मौसम में बुनियादी कोई फर्क नहीं है न पर्यावरण चेतना है।


गांतोक में राज्य सरकार की कमान दशकों से पवन चामलिंग के हाथों में है,जो बहुत जल्द कामरेड ज्योति बसु के लगातार मुख्यमंत्री बने रहने का रिकार्ड तोड़ देने वाले हैं।


सिक्कम के सीमावर्ती इलाकों में सेना ही मुख्य तौर पर आपदाओं से निबटती है और इसलिए पवन चामलिंग को आपदा प्रबंधन को लेकर खास सरदर्द नहीं है।


वैसे भी बाकी हिमालयी क्षेत्रों कीतुलना में कश्मीर संकट के बाद पर्यटन के लिहाज से गांतोक और बाकी सिक्किम का खूब विकास हुआ है और गांतोक से ऊपर बर्फ छके पहाड़ों तक पहुंचने वाले तमाम रास्ते सेना के हवाले है।


गांतोक में भी एक कदम पैदल चलेन की गुंजाइश नहीं है क्योंकि शहर के चप्पे चप्पे पर ऊंचाइयों और ढलान पर उतरने चढ़ने के लिए हर कदम पर टैक्सी है।पर्यटकों को दो चार दिन गांतोक अगर टहरना बी पड़े तो उनकी सेहत में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है।


सिक्किम में भारी पैमाने पर पूंजी निवेश हो रहा है।पर्यटन और पूंजी के इस खेल में आम जनता की जाम माल को लेकर जाहिर है कि सत्तावर्ग को कोई ज्यादा फिक्र भी नहीं है।


जाहिर है,मूसलाधार बारिश से पर्यटन को होने वाले नुकसान से ही पवन चामलिंग को सरदर्द हो सकता है।आपदा प्रबंधन को लेकर नहीं।लेकिन भारत सरकार या बंगाल की राज्य सरकार को कनक नदी में कृत्तिम जलाशय के निर्माण से भागीरथी की 1978 जैसी बाढ़ के हालेता से निपटने की कितनी चिंता है,इसका अभी पता नहीं चला है।


हांलाकि अबकी दफा मौसम चेतावनी के मुताबिक मूसलाधार बारिश होने से वह कृत्तिम झील टूटने ही वाली है।


गौरतलब है कि इसी कनक नदी पर एनएचपीसी के कई बिजली संयंत्र लगे हैं और उन्हें सबसे ज्यादा खतरा है।एनएचपीसी में इसे लेकर खलबली मची है।सिक्किम में एनएचपीसी के कई पनबिजली उत्पादन केंद्रों के खतरे में पड़ जाने का अंदेशा है।


बहरहाल सीडब्ल्यूसी की टीम ने कनक नदी पर बनी इस कृत्रिम झील से उत्पन्न खतरे का आंकलन किया है और अपनी रपट सिक्किम सरकार, एनडीएमए और एनएचपीसी को सौंप दी है। इस रपट में इस बात का आंकलन किया गया है कि कृत्रिम झील के अंदर कितना पानी जमा है? साथ ही इसमें कितनी तेजी से इजाफा हो रहा है?

65 मीटर है डैम की ऊंचाई

सीडब्ल्यूसी के ताजा रपट के मुताबिक, कनका नदी पर बनी कृत्रिम झील के डैम की ऊंचाई 65 मीटर है। नदी में पानी इस डैम से ओवरफ्लो कर रहा है। गौरतलब है कि कनक नदी तीस्ता नदी की सहायक नदी है और ये मंगन से तीन किलोमीटर पहले तीस्ता नदी में मिलती है। तीस्ता और कनका के संगम स्थान से चार किलोमीटर पहले कनका नदी पर भूस्खलन से यह कृत्रिम झील बनी है।

गौरतलब है कि कृत्रिम झील से 21 किलोमीटर की दूरी पर तीस्ता नदी पर एनएचपीसी का पनबिजली डैम है।

रपट के मुताबिक, कनका नदी का कैचमेंट एरिया 739 वर्ग किलोमीटर का है और इसमें से 264 वर्ग किलोमीटर 4500 मीटर से ऊपर की ऊंचाई पर है। इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि 475 वर्ग किलोमीटर के इलाके में होने वाली बारिश से कनक नदी पर बनी कृत्रिम झील में पानी जा रहा है। सीडब्ल्यूसी की मानें तो, 65 मीटर गहरी झील में तकरीबन 75.5 लाख घन मीटर पानी जमा हो चुका है।


ऐसे में वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि मानसून की झमाझम बारिश के बीच कृत्रिम झील के फटने का खतरा है। ऐसी स्थिति में क्या होगा इसका आंकलन भी किया गया है।



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लगातार गहराते जल महायुद्ध गृहयुद्ध से कैसे बच सकें हम? तमिलनाडु का जल संकट कश्मीर विवाद से कम जटिल नहीं है क्योंकि कावेरी से ही भारत के साथ जुड़ा है तमिलनाडु। कृषि संकट में उलझे कर्नाटक के किसानों के पास भी क्या विकल्प है? आइये याद करें रोहिणी जल विवाद हल करने में राजकुमार सिद्धार्थ की भूमिका! पलाश विश्वास

लगातार गहराते जल महायुद्ध गृहयुद्ध से कैसे बच सकें हम?

तमिलनाडु का जल संकट कश्मीर विवाद से कम जटिल नहीं है क्योंकि कावेरी से ही भारत के साथ जुड़ा है तमिलनाडु।

कृषि संकट में उलझे कर्नाटक के किसानों के पास भी क्या विकल्प है?

आइये याद करें रोहिणी जल विवाद हल करने में राजकुमार सिद्धार्थ की भूमिका!

पलाश विश्वास

बेहतर होता कि हम यह विमर्श तमिल और कन्नड़ में शुरु कर पाते।क्योंकि इसके संदर्भ और प्रसंग दोनों कावेरी जलविवाद को लेकर घमासान से जुड़ते हैं।तमिलनाडु को पानी देने के लिए सुप्रीम कोर्ट को फिर हस्तक्षेप करना पड़ा है और इसके खिलाफ कर्नाटक में जबर्दस्त प्रदर्शन हो रहा है। हम तमिल या कन्नड़ भाषा नहीं जानते।अंग्रेजी दक्षिण भारत में  आम जनता की बोली उसीतरह नहीं है,जैसे बाकी भारत में।


यह मसला सिर्फ कावेरी जलविवाद से जुड़ा नहीं है,यह गहराते जल संकट की युद्ध परिस्थितियों के साथ जल जंगल जमीन और आजीविका से कृषि प्रधान भारत को सुनियोजित तरीके से ध्वस्त करने का मामला है और इस पर यथासंभव हर जनभाषा और बोली में हम जितनी जल्दी संवाद कर सकें, बेहतर है।


फासिस्ट राजकाज की निरंकुश सत्ता दिल्ली में केंद्रित होकर जीवन का हर क्षेत्र अब सामंती और साम्राज्यवादी उपनिवेश है तो देश के कोने कोने में आम बहुसंख्या जनता पर एकाधिकार कारपोरेट हमले हो रहे हैं।


इसी वजह से सत्ता की राजनीति चूंकि गाय पट्टी से आकार लेती है,तो वहां की मातृभाषा के राजभाषा बन जाने से हिंदी का हिंदी क्षेत्र से बाहर राजनीतिक विरोध प्रबल है।वरना तमिलनाडु से लेकर पूरे दक्षिण भारत में,बंगाल में और पूर्वोत्तर में लोग हिंदी पढ़े या लिखें न भी तो हिंदी खूब समझते हैं।


हिंदी की सार्वभौम इस ग्रहणीयता और संवाद की भाषा बनने के लिए भारतीय सिनेमा का आभार मानना चाहिए।साहित्य हिंदी का लोग जाने या न जाने,हिंदी फिल्में देखे बिना देश के किसी भी हिस्से में जनता के सारे ख्वाब खत्म हैं,जान लीजिये।


कावेरी जलविवाद की समस्या है तो जलविवाद अब सार्वभौम है।


क्योंकि हम अपनी जरुरत के मुकाबले कई कई पृथ्वी के अतिरिक्त संसाधनों का दोहन करके इस पृथ्वी का रोज दसों दिशाओं में सत्यानाश कर रहे हैं।


नतीजतन हमारा हिमालय मर रहा है तो हम समुद्रतटों को रेडियोएक्टिव बना रहे हैं और हरियाली को खत्म करके सबकुछ गेरुआ बनाने में लगे हैं।बड़े बांधों का कहर अभी पूरी तरह टूटा नहीं है हालांकि सालाना मनुष्यकृत आपदाओं का मुक्तबाजारी महोत्सव और राहत सहायता के पाखंड का अनंत सिलसिला जारी है।

गहराते जलसंकट की वजह पिघलते हुए ग्लेशियर है,ग्लोबल वार्मिंग है,अनियमित मानसून है,बदलता हुए मौसम और जलवायु हैं,तो इन सारे कुकृत्यों की वजह विकास के नाम हमारा नरसंहारी धतकरम है।अबाध पूंजी की अंधी दौड़ बेलगाम है।


अब यह तनिक विचार कर लें कि ब्रह्मपुत्र नदी के मुहाने को बांधने की चीन की हरकत को अगर हम भारत और समूचे दक्षिण एशिया के खिलाफ खुला युद्ध मानते हैं तो फरक्का में पद्मा नदी का पानी रोक लेने पर बांग्लादेश की प्रतिक्रिया जन्मजात मानवबंधन और साझा इतिहास,साझा विरासत,साझा संस्कृति के बावजूद इसतर भारतविरोधी क्यों हो जाती है।


इसीतरह तनिकमझ भी लें कि बांग्लादेश को पानी देने के किसी समझौते के सवाल पर बंगाल के किसानों के हितों को लेकर बंगाल की अग्निकन्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सिरे से इंकार कर देती है। फिर बिहार के मुख्यमंत्री अपने राज्य को बाढ़ से बचाने के लिए फरक्का बांध को ही तोड़ देने की वकालत क्यों करने लगते हैं। फिर ममता बनर्जी भी बंगाल में बाढ़ के लिए  दामोदर वैली निगम के बांध के खिलाफ एतनी आगबबूला क्यों हैं।अभी तो हमने नर्मदा बांध और टिहरी बांधों के नतीजों का समाना नहीं किया है,जो और भयंकर होने वाले हैं।


सिंधु घाटी के इतिहास को बांचे बिना हम अपनी नगर केंद्रित सभ्यता को समझ नहीं सकते।विश्वभर की प्राचीन सभ्यताओं में जीवन सीधे नदियों से जुड़ा से है क्योंकि जल के बिना जीवन असंभव है।


हम जिसतरह गंगा यमुना नर्मदा समेत तमाम नदियों को मां मानते हैं उसीतरह प्राचीन मिस्र में भी नील नदी की पूजा होती रही है।गंगा की तरह नील भी देवी है।मोसापिटामिया की सभ्यता में भी दजला और फरात का वही महत्व है जैसे आर्यों के आगमन के बाद भारतीयता की सारी कथाएं गंगा और यमुना से जुड़ती है।


थेम्स से लंदन है तो सीन से पेरिस।रूस की कल्पना दोन के बिना की ही नहीं जा सकती।अबाध जल प्रवाह ही सभ्यता की विकासयात्रा है।उसी अबाध जलप्रवाह को विकास के नामपर बांधते रहकर जल को राष्ट्रीयता के नाम  किसी व्यक्ति और समुदाय की निजी और कारपोरेट संपत्ति बना देने की वजह से आज यह जलहायुद्ध है।


तमिलनाडु या बांगल्लादेश की समस्या शायद हम तभी समझ सकेंगे जब राजधानी नई दिल्ली और उससे जुड़े तमाम नगर उपनगर टिहरी जलाशय के पानी पर निर्भर हो जाये और उत्तराखंड की शक्ति इतनी बड़ी हो जाये कि वह टिहरी का जल दिल्ली और यूपी ,पंजाब, हरियाणा को देने से मना कर दें।तभी हम तमिलनाडु का दर्द और उसके लिए बिन पानी गहराते अस्तित्व संकट को समझने की मनःस्थिति बना सकेंगे।


भारत में गंगा यमुना के मैदानों से जुड़े राज्यों के अलावा बंगाल और पंजाब कमसकम दो सूबे हजारों सालों से नदियों पर निर्भर रहे हैं।


अखंड बंगाल नदीमातृतक है और यहां की जीवन यात्रा नदी से शुरु होती है तो नदी में खत्म होती है और लोगो की भाषा और लोक संस्कृति में सर्वत्र ये नदियां अबाध बहती रहती हैं।बंगाल में हजारों तरह के लोकगीत नदी के साथ जुड़े हैं तो गाय पट्टी में भी तीज त्योहार, धर्म संस्कार,रीति रिवाज ,जनम मृत्यु पवित्र गंगा जल के बिना असंभव है।


इसीतरह पांच नदियों से ही पंजाब है।नदियों की बहती धार ही पंजाब की मस्ती है।पंजाब की समृद्ध संस्कृति और जिंदगी अपने तरीके से जीने की जिद है।


तमिलनाडु के प्रसंग में यह मामला बेहद संवेदनशील है क्यंकि बाकी भारत से उसकी भाषा,संस्कृति एकदम अलहदा है।


जैसे कश्मीर की समस्या इसीलिए जटिल है कि वह बाकी भारत से हर मायने में अलहदा है।


बंगाली,मराठी और पंजाबी जैसी राष्ट्रीयताएं कम ताकतवर या कम आजाद नहीं है।


पंजाब में धर्म भी हिंदुत्व से अलग है।लेकिन पंजाब हजारों सालों से आर्यावर्त का हिस्सा रहा है और बंगाल आर्यावर्त स बाहर व्रात्य और अनार्य होने के बावजूद बुद्धमय बंगाल के पतन के बाद चैतन्य महाप्रभु और कवि जयदेव की वजह से बाकी भारत से जुड़ गया तो अंग्रेजी हुकूमत,आदिलवासी किसान आंदोलनो और जनविद्रोहों के साथ सात नवजागरण और बहुजन दलित आंदोलन के मार्फत बाकी भारत से उसका अलगाव लगातार खत्म होता रहा है।


महाराष्ट्र आदिकाल से आर्यावर्त से बाहर रहा है बंगाल की तरह तो उसका नाता बुद्धमय बंगाल से ज्यादा गहरा है और पंजाब को मिला ले तो ये तीनों राज्य ब्राह्माण धर्म की निरंकुश सत्ता के खिलाफ युद्ध के सबसे बड़े मोर्चे हैं।


अब भी पूर्वोत्तर में  भारत को विदेश माना जाता है और पूर्वोत्तर से आने वालों से राजधानी नई दिल्ली में विदेशियों से भी बुरा सलूक उसी तरह किया जाता है जैसे कश्मीर के लोगों के साथ।पूर्वोत्तर में चीन और म्यांमार की चीजों की कदर ज्यादा है भारतीय उपभोक्ता समाग्रियों की तुलना में।


पूर्वोत्तर के इस अलगाव की का खास वजह राजनीति है तो इसकी एक बड़ी वजह हैकि हमारी गंगा या यमुना या नर्मदा या कृष्णा या कावेरी जैसी कोई नदी पूर्वोत्तर को बाकी भारत से जोड़ती नहीं है।


यही खास मुद्दा है।


मूलतः अनार्य द्रविड़ भाषा और संसकृति की पहचान के सवाल पर आत्म सम्मान के द्रविड़ आंदोलन की भाव भूमि को बाकी देश से कावेरी नदी ही जोड़ती है।


इसलिए कावेरी का जल विवाद सिर्फ जल विवाद नहीं है,यह बाकी भारत से तमिलनाडु के नाभि नाल का संबंध सेतु है।मैसूर जब था कर्नाटक,तबसे यह जलविवाद बार बार पेचीदा होता रहा है।


मसला पेचीदा इसलिए भही है क्योंकि बाकी देश की तरह कर्नाटक के किसानों के लिए भी कृषि संकट गहरा जाने से वे लोकतातंत्रिक तरीके से तमिलनाडु को पानी का हिस्सा देने को तैयार नहीं है और पानी उनके लिए भी जीवन मरण की समस्या है।


बड़े बांधों ने जो विषम परिस्थितियां बना दी है,उससे अब बहुत देर तक जल युद्ध को चाटाल पाना असंभव है और पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों की जो काररपोरेट एकाधिकारवादी नरसंहारी लूटखसोट मची है, उस लिहाज से जल भी अब बहुत तेजी से निजी कारपोरेट संपदा में बदले लगी है।


जैसे जंगल के अब कारपोरेट राष्ट्रीयता की आड़ में कारपोरेट संपदा बन जाने से जंगल से जुड़े आदिवासी भूगोल में सलवा जुड़ुम सार्वभौम है,उसीतरह नदियों के बंध जाने और जल के निजी कारपोरेट संपदा में बदल जाने से राष्ट्रीयता की आड़ में राष्ट्रों और राज्यों के बीच युद्ध और गृहयुद्ध परिसि्थतियां गगनघटा गहरानी है।


तमिलनाडु जैसे राज्य के मामले में यह कश्मीर से जटिल समस्या है क्योंकि कावेरी के अलावा बाकी भारत के साथ तमिलनाडु का शायद ही कोई वास्तविक संबंध है जिससे चरमराते हुए संघीय लोक गणराज्य के ढांचे में फासिस्ट निरंकुश सत्ता की नई दिल्ली बहाल रख सकें।संसदीय लोकतंतत्र से नाता भी कावेरी का जलसेतु है,इसे समझ लें।


नदी जल बंटवारा कोई नयी समस्या है,ऐसा भी नहीं है।


भारत के गणरज्यों ने मोहनजोदाड़ो हड़प्पा के सिंधु सभ्यता समय से इस समस्या का सामना बार बार किया है और हर बार इसे सामाजिक यथार्थ के मुताबिक सुलझाया है।


इसी प्रकरण में कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ के तथागत गौतम बुद्ध बनने की कथा है।जल महायुद्ध और गृहयुद्ध के प्रसंग में जल संकट सुलझाने की भारतीय गणराज्यों की गौरवशाली पंरपरा में लौटने के लिए तथागत के जीवन में निर्णायक रोहिणी जल विवाद को समझने की जरुरत है।


इसी विवाद की वजह से राजकुमार सिद्धार्थ ने स्वेच्छा निर्वासन स्वीकार किया था क्योंकि जल विवाद में उलझे शाक्य और कोलियों के विवाद में उनके मत के खिलाफ बहुमत था और इसी बहुमत के सामने सर झुकाकर सिद्धार्थ ने राजमहल त्याग करके देशाटन का विकल्प चुना था।शाक्य गणराज्य ने कोलियों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी थी और राजकुमार सिद्धार्थ इस आत्मघाती युद्ध के विरुद्ध थे।


शाक्यों ने चूंकि बहुमत से राजकुमार सिद्धार्थ का युद्धविरोधी तर्क खारिज कर दिया था,इसलिए उन्होंने कपिलवस्तु को छोडने का निर्णय किया।


जाहिर है,रोग शोक जरा मृत्यु और सन्यास के यथार्थ से आकस्मिक मोहभंग की कथा से राजकुमार गौतम के गृहत्याग की किंवंदती से कोई लेना देना नहीं है।यह प्रक्षेपण बुद्धमय भारत के अवसान के बाद ब्राह्मण धर्म के विष्णुपद और पिंडदान की कथा की तरह  समता और न्याय के लिए गौतम बुद्ध की सामाजिक क्रांति को रद्द करने की प्रतिक्रांति के तहत उनके बुद्धत्व के निर्वाण को ब्राह्मणत्व के अवतारवाद के तहत मोक्ष की आध्यात्मिक खोज में बदलने के मकसद से गढी हुई कथा है।


इसके विपरीत सिद्धार्थ के गृहत्याग की असल वजह शाक्यों और कोलियों  के जलविवाद की वजह से बनी युद्ध परिस्थितिया हैं।


गौरतलब है कि गौतम बुद्ध के गृहत्याग के बाद हालांकि शाक्यों और कोलियों ने उन्हीेंके बताये रास्ते पर जलविवाद का समाधान कर लिया,लेकिन तब तक सत्य की खोज में गौतम बुद्ध की अनंत यात्रा शुरु हो चुकी थी और वे फिर कभी राजमहल में लौटे नहीं।


मौजूदा जल संकट को सुलझाने के लिए ढाई हजार साल पहले हमारे ही प्राचीन गणराज्यों की उस लोकतांत्रिक परंपरा में लौटने की जरुरत है और विस्तार से इस कथा को जाने समझने की अनिवार्यता है।


वीकिपीडिया में इस विवाद का ब्यौरा इस प्रकार हैः

बुद्ध शाक्य वंश के थे--देखे सुत्तनिपात पालि और उनका वास्तविक नाम सिद्धार्थ था। उनका जन्म कपिलवस्तु (शाक्य महाजनपद की राजधानी) के पास लुंबिनी (वर्तमान में दक्षिण मध्य नेपाल) में हुआ था। इसी स्थान पर, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक ने बुद्ध की स्मृति में एक स्तम्भ बनाया था।

सिद्धार्थ के पिता शाक्यों के राजा शुद्धोदन थे। परंपरागत कथा के अनुसार, सिद्धार्थ की माता महामाया उनके जन्म के कुछ देर बाद मर गयी थी। कहा जाता है कि उनका नाम रखने के लिये 8 ऋषियो को आमन्त्रित किया गया था, सभी ने 2 सम्भावनाये बताई थी, (1) वे एक महान राजा बनेंगे (2) वे एक साधु या परिव्राजक बनेंगे। इस भविष्य वाणी को सुनकर राजा शुद्धोदन ने अपनी योग्यता की हद तक सिद्धार्थ को साधु न बनने देने की बहुत कोशिशें की। शाक्यों का अपना एक संघ था। बीस वर्ष की आयु होने पर हर शाक्य तरुण को शाक्यसंघ में दीक्षित होकर संघ का सदस्य बनना होता था। सिद्धार्थ गौतम जब बीस वर्ष के हुये तो उन्होंने भी शाक्यसंघ की सदस्यता ग्रहण की और शाक्यसंघ के नियमानुसार सिद्धार्थ को शाक्यसंघ का सदस्य बने हुये आठ वर्ष व्यतीत हो चुके थे। वे संघ के अत्यन्त समर्पित और पक्के सदस्य थे। संघ के मामलों में वे बहुत रूचि रखते थे। संघ के सदस्य के रुप में उनका आचरण एक उदाहरण था और उन्होंने स्वयं को सबका प्रिय बना लिया था। संघ की सदस्यता के आठवें वर्ष में एक ऐसी घटना घटी जो शुद्धोदन के परिवार के लिये दुखद बन गयी और सिद्धार्थ के जीवन में संकटपूर्ण स्थिति पैदा हो गयी। शाक्यों के राज्य की सीमा से सटा हुआ कोलियों का राज्य था। रोहणी नदी दोनों राज्यों की विभाजक रेखा थी। शाक्य और कोलिय दोनों ही रोहिणी नदी के पानी से अपने-अपने खेत सींचते थे। हर फसल पर उनका आपस में विवाद होता था कि कौन रोहिणी के जल का पहले और कितना उपयोग करेगा। ये विवाद कभी-कभी झगड़े और लड़ाइयों में बदल जाते थे। जब सिद्धार्थ २८ वर्ष के थे, रोहणी के पानी को लेकर शाक्य और कोलियों के नौकरों में झगड़ा हुआ जिसमें दोनों ओर के लोग घायल हुये। झगड़े का पता चलने पर शाक्यों और कोलियों ने सोचा कि क्यों न इस विवाद को युद्ध द्वारा हमेशा के लिये हल कर लिया जाये। शाक्यों के सेनापति ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा के प्रश्न पर विचार करने के लिये शाक्यसंघ का एक अधिवेशन बुलाया और संघ के समक्ष युद्ध का प्रस्ताव रखा। सिद्धार्थ गौतम ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और कहा युद्ध किसी प्रश्न का समाधान नहीं होता, युद्ध से किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी, इससे एक दूसरे युद्ध का बीजारोपण होगा। सिद्धार्थ ने कहा मेरा प्रस्ताव है कि हम अपने में से दो आदमी चुनें और कोलियों से भी दो आदमी चुनने को कहें। फिर ये चारों मिलकर एक पांचवा आदमी चुनें। ये पांचों आदमी मिलकर झगड़े का समाधान करें। सिद्धार्थ का प्रस्ताव बहुमत से अमान्य हो गया साथ ही शाक्य सेनापति का युद्ध का प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हो गया। शाक्यसंघ और शाक्य सेनापति से विवाद न सुलझने पर अन्ततः सिद्धार्थ के पास तीन विकल्प आये। तीन विकल्पों में से उन्हें एक विकल्प चुनना था (1) सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेना, (2) अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिए राजी होना, (3) फाँसी पर लटकना या देश निकाला स्वीकार करना। उन्होंने तीसरा विकल्प चुना और परिव्राजक बनकर देश छोड़ने के लिए राज़ी हो गए।(साभार वीकिपीडिया)।



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Monday, September 5, 2016

नकली राजमहल में नारायणी सेना का प्रशिक्षण जारी,कूच बिहार बनने लगा सरदर्द का सबब बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्य बन रहे हैं जिहादियों के अड्डे एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास हस्तक्षेप संवाददाता

नकली राजमहल में नारायणी सेना का प्रशिक्षण जारी,कूच बिहार बनने लगा सरदर्द का सबब

बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्य बन रहे हैं जिहादियों के अड्डे

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

हस्तक्षेप संवाददाता

सिलिगुड़ी।उत्तर बंगाल के हालात आहिस्ते आहिस्ते बेकाबू हो रहे हैं।ममता बनर्जी के कड़े विरोध पर नारायणी सेना को प्रशिक्षण देना बंद कर दिया है भारतीय सीमा सुरक्षा बल ने।फिरभी कूचबिहार में अलग राष्ट्र न सही,नगर के बाहर पांचएकड़ जमीन पर नकली राजप्रासाद बनाकर अलगाववादी संगठन कूचबिहार पीपुल्स एसोसिएशन के एक गुट ने नारायणी सेना का उसी राजप्रासाद में प्रशिक्षण जारी रखा है।


उसी राजप्रासाद में वर्दीधारी पुरुष और महिला राजकर्मियों के लेकर संगय़न के नेता बाकायदा राजसिंहासन पर बैठकर राजकाज चलाते हैं।अलग कूचबिहार के लिए यह अभूतपूर्व तैयारी है।प्रशासन के सारी खबर है।लेकिन इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी नहीं मिल रही है।


आदिवासी विकास परिषद और गोरखालैंड की राजनीति अलग है।कूचबिहार में विभिन्न समुदाओं कामतापुरी सर्थकों,आदिवासियों और गैरकामतापुरी और गैरआदिवासी समुदायों के बीच टकराव के हालात हैं,जो विस्फोटक हो सकते हैं।


वेटिकन सिटी में मद टेरेसा को संत की उपाधि के मौके पर वहां पहुंचकर ममता दीदी ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और उनकी टीम से दूरी बनाये रखकर वापंथिययों के नक्से कदम पर कोलकाता और बांग्ला राष्ट्रीयता का झंडा बुलंद किया है।इसे उनके समर्थक उनकी ऐतिहासिक जीत मान रहे हैं।


जाहिर है कि सिंगुर में भूमि अधिग्रहण के ऐतिहासिक फैसले से दीदी को बहुतभारी जीत मिली है और वामपंथियों को भी निर्मायक तौर पर उन्होंने शिकस्त जरुर दी है लेकिन राज्यभर में अन्यत्र भूमि अधिग्रहण खारिज करने का जो आंदोलन शुरु हो गया है,उससे पूंजी निवेश का मामला फिर खटाई में है।


सिंगुर फैसले के साथ साथ दीदी ने वर्धमान में तैयार हो रहे आधे अधूरे मिष्टि हब को अन्यत्र हाटोने का ऐलान कर दिया है।इससे उनके ही पीपीपी माडल के विकास के माडल को गहरा झटका लगा है।बाकी देश में बीि इसका असर होना है।


कोचबिहार में राजतंत्र के तौर तरीके के साथ अलग कूचबिहार का जो आंदोलन नारायणी सेना को प्रशिक्षण के साथ उग्रतर होता जा रहा है,वह सिर्फ ममता बनर्जी नहीं,बाकी देश के लिए भी सरदर्द का सबब बनता जा रहा है।

इसी बीच केंद्र सरकार की खुफिया एजंसियों के हवाले से बंगाल और पूर्वोत्तर में जिहादियों की घुसपैठ और उनके अड्डों की खबर मौजूदा अलगाववादी संगठनों के साथ उनके मिलकर भारतविरोधी गतिविधियां चलाने के नतीजे कितने खतरनाक हो सकते हैं,यह मामला भी गरमाने लगा है।


बांगलादेश में हाल में हुई आतंकवादी हरकतों के तार सीधे तौर पर इन्ही राज्यों से जुड़ रहे हैं,इसके बावजूद आत्मघाती राजनीति का जलवा बहार है।


जो राजनीतिक उतना नहीं है जितना सीधे तौर पर कानून और व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है और इस सिलसिले में राज्य और केंद्र सरकार दोनों की खास जिम्मेदारियां हैं।


इसके उलट उत्तर बंगाल में पांव जमाने के लिए केंद्र की सत्ता पर काबिज कसरिया पल्टन जिस तरह कामतापुरी से लेकर अल्फा को खुल्ला समर्थन दे रहे हैं,उससे असम अल्फा के हवाले तो हो ही गया है,अब कूचबिहार के हालातभी संगीन है।


गनीमत है कि गोरखालैंड आंदोलन अभी ठंडा है और विमल गुरुंग और उनके प्रतिद्वंद्वी फिलहाल मौन हैं।दार्जिलिंग से सांसद भाजपा के हैं।इसके मद्देनजर गोरखा आंदोलन की कमान भी अब संघियों के हाथ में है।


दीदी वेटिकन सिटी से जर्मनी की ओर कूच कर गयी हैं विदेशी पूंजी की तलाश में।लेकिन विपक्ष के सफाये के बावजूद गैरसंवैधानिक संगठनों की अनदेखी से लोकतांत्रिक विपक्ष से बड़ी चुनौती देर सवेर उन्हें मिलने जा रही है।


प्रशासन और पुलिस को सबकुछ मालूम है लेकिन वे दीदी की हरी झंडी के बिना कुछ भी करने में असमर्थ है।


असम आंदोलन में आठवे दशक के दौरान हुए खूनखराबे के बाद गैरअसमिया कारोबारियों ने अपना कारोबार सिलीगुड़ी में स्थानांतरित कर लिया है।बाकी भारत से असम और पूर्वोततर को जोड़ने वाला सबसे बड़ा जंक्शन है जहां पूरे बंगाल में कारोबर की स्थिति सबसे बेहतर है और पूंजी निवेश का माहौल भी है।


यह सब कभी भी गुड़गोबर हो सकता है।


जाहिर है कि राजनीतिक सत्ता के लिए राष्ट्रहित को बलि चढ़ाने में राजनेताओं को कोई खास परेसानी नहीं होती,इसलिए बंगाल और असम समेत समूचे पूर्वोत्तर के मौजूदा हालात कश्मीर की तुलना में भी ज्यादा पेचीदा होते जा रहे हैं।जिसे लेकर फिलहाल केंद्र या राज्यसरकार को खास तकलीफ नहीं हो रही है।



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कोलकाता की संत टेरेसा और अविद्या के अहंकार का महातिलिस्म धर्मोन्मादी राष्ट्र पलाश विश्वास


कोलकाता की संत टेरेसा और
अविद्या के अहंकार का महातिलिस्म धर्मोन्मादी राष्ट्र
पलाश विश्वास
आज कोलकाता के अखबारों में मातृसत्ता की जयजयकार है और बाकी देश के मीडिया में भी सुर्खियों में कोलकाता की मां संत टेरेसा है।महिषासुर और असुर विमर्श के संदर्भ में निवेदन है कि मेरी बंगाल के दुर्गा भक्तों से हाल के वर्षों में बहस होती रही है और उनमें से एक बड़े हिस्से का भी मानना है कि मातृसत्ता की दुर्गा प्रतिमा से महिषासुर वध प्रकरण को अलहदा करने की जरुरत है।

इस विमर्श का प्रस्थानबिंदू यही है कि अविद्या के अहंकार का महातिलिस्म राष्ट्र है और यही अविद्या राष्ट्र पर काबिज पूंजी है।सत्ता वर्ग की लोकतंत्र विरोधी फासिस्ट निरंकुश सत्ता भी वही अविद्या है जो मुक्तबाजारी माया का संसार है तो ज्ञानविरोधी अस्मितापरक विमर्श में लोकतंत्र और जनवाद का विध्वंस है।

आम जनता की तकलीफों और रोजमर्रे की नरकयंत्रणाओं के मूल में भी सत्ता समर्थित इस अविद्या की संस्थागत संरचना है,जो कुल मिलाकर पितृसत्ता की नरसंहारी नस्ली संस्कृति है।इसे सिरे से तोड़े बिना कोई परिवर्तन या परिवर्तन का सपना भी असंभव है।

महिषासुर वध के प्रक्षेपण को अलग कर दें तो मातृसत्ता  अनार्य द्रविड़ असुर विरासत है,जिसका भारतीयकरण हुआ है।

इसी मातृसत्ता का आवाहन का महोत्सव बंगाल में धर्मनिरपेक्ष दुर्गोत्सव है और कोलकाता की संत मां टेरेसा को अनार्य बंगाल इसी दुर्गा प्रतिमा में स्थापित कर रहा है,उनके ईसाई मिशनरी होने से कोई फर्क नहीं पड़ा है।

जाहिर है कि महिषासुर वध की नरसंहारी संस्कृति और मनुस्मृति आधारित मिथक का विरोध अनिवार्य है क्योंक यह मिथक अपने आप में बंगाल के इतिहास,भूगोल,लोक परंपरा और विरासत के खिलाफ है।तो यह भारतीयता के आध्यात्म और धर्म निरपेक्ष जनवादी लोकतंत्र के खिलाफ भी मिथ्या का सर्वव्यापी तंत्र मंत्र यंत्र  है।

दुर्गापूजा की धर्मनिरपेक्ष मातृसत्ता अनार्य द्रविड़ नृवंश की निरंतरता है,जो असुर संस्कृति भी है पितृसत्ता के ब्राह्मणधर्म के खिलाफ।

हमारे विद्वान मित्र इस पर गौर करें कि मातृसत्ता के आवाहन का विरोध करके कहीं वे कहीं पितृसत्ता के ब्राह्मण धर्म की निरंतरता का आत्मघाती अस्मिता युद्ध में निष्णात तो नहीं हो रहे हैं।यह आत्मालोचना निहायत जरुरी है अगर वे बदलाव के हक में हैं।

हम मातृसत्ता के विरोध को आत्मध्वंस मानते हैं।बंगाल में हाल के परिवर्तनों से लेकर सामंतवाद, साम्राज्यवाद और यहां तक कि ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता के विरोध की मातृ आराधना की लोक परंपरा पर हम नये सिरे से संवाद कर सकें तो बेहतर।

मां टेरेसा के कोलकाता के संत बन जाने के मौके से बेहतर कोई अवसर नहीं है कि हम मातृसत्ता के जनवाद और लोकतंत्र पर नये विमर्श की शुरुआत करें।

कोलकाता में दक्षिणेश्वर और कालीघाट की काली के अलावा एक और काली है,एटंनी फिरंगी की काली।एंटनी फिरंगी जाहिर है कि भारतीय नहीं थे और वे जन्मसूत्र से अंग्रेज भी नहीं थे।वे भारत में पुर्तगीज विरासत के वारिस थे और उन्होंने सती दाह से बचाकर एक हिंदू विधवा से विवाह कर लिय़ा था,हिंदुत्ववादियों ने फिर एंटनी की अनुपस्थिति में उस विधवा का अपहरण करके उसे जिंदा जला दिया था।

यही एंटनी फिरंगी की व्यथा कथा है जो उन्होंने कवि गान में जिया है। उन्होंने बांग्ला कविगान में अपना जीवन समर्पित किया तो वे मां काली के उपासक भी थे।

एंटनी फिरंगी के इस आख्यान का मंगल पांडे पर बनी फिल्म में अच्छा उपयोग किया गया है।क्योंकि भारत की पहली स्वतंत्रता संग्राम के खिलाफ था बंगाल का ब्राह्मण तंत्र और उसकी निरंकुश निर्ममता का  आइना यह आख्यान है जो फिर फिर लौटकर आ रहा है और गुजरात के वधस्थल तक उसकी निरंतरता है जो ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान है।विडंबना है कि भारतभर में इसकी पुनरावृत्ति का मुक्तबाजारी वैश्विक उपक्रम है।

जाहिर है कि एटंनी फिरंगी की काली पूजा दैवी काली की आध्यात्मिक उपासना नहीं है,बल्कि मातृसत्ता के लोक में गहरे पैठकर लोक गीतों के अंतःस्थल में गहरे पैठने की धर्मनिरपेक्ष रचना प्रक्रिया है।बंगाल में प्राकृति विपदाओं से बचने के लिए रक्षा काली की पूजा बंगाल में ब्राह्मण धरम से पहसे शिव की उपसना के साथ होती रही है।चंडी तो उसे बाद में बनाया गया है और चंडी बनकर ही काली रणचंडी है।

इसमें कोई शक नहीं है कि जो भी कुछ हम भारतीय बताते हैं,उसका मूल स्रोत अनार्य द्रविड़ लोक जीवन है।अनार्य द्रविड़ संसाधनों,सभ्यता और विरासत का भारतीयकरण हिंदुत्व के एकीकरण अभीयान के तहत इसीतरह होता रहा है।

जैसे ढाई हजार सा पहले बौद्ध धम्म और जैन धर्म के दर्शन को आत्मसात करके ब्राह्मण धर्म सनातन वैदिकी कर्म कांड से अलग होकर हिंदुत्व में आहिस्ते आहिस्ते आकार लेता रहा विविधता और बहुलता को आत्मसात करते हुए,वैसे ही लोक पंरपराओं और विरासत का लोक जीवन का भी समायोजन हिंदुत्व में हुआ है और अनार्य द्रविड़ मातृसत्ता का भी हिंदुत्वकरण हुआ है लोक देवियों के चंडी रुप में आवाहन और सतीपीठों के माध्यम से।

विडंबना है कि ब्राह्मण धर्म ने मातृसत्ता का आवाहन भी हमेशा पितृसत्ता को मजबूत बनाकर मनुस्मृति अनुशासन और सख्ती से लागू करने की रणनीति के तहत सुनियोजित रंगभेद की पितृसत्ता के तहत  किया है और अपनी विरासत की जड़ों से कटे हुए हमें ठीक से भी मालूम नहीं है कि किस बिंदू पर विरोध करें और किस पर विरोध न करें।हमें मालूम भी नहीं है कि मातृसत्ता हमारी विरासत है और ब्राह्मणधर्म स्त्री को शूद्र बनाकर स्त्री अस्मिता के निषेध पर आधारित मातृसत्ता का निरंकुश दमन है।

काली और दुर्गा के मिथकों में अंततः निग्रोइड द्रविड़ और असुर विरासत की ही निरंतरता है और इसे महिषासुर वध से जोड़कर उसका ब्राह्मणीकरण कर दिया गया है।

इस प्रस्थान बिंदु पर मातृसत्ता की धर्मनिरपेक्षता और सामंती साम्राज्यवादी व्यवस्था के विरुद्ध इस मातृसत्ता के प्रतिरोध की जमीन को पहचानने की बहुत जरुरत है।

बुद्धमय बंगाल में हिंदुत्वकरण के बाद आक्रामक वर्चस्ववादी रंगभेदी जाति व्यवस्था के कठोर मनुस्मृति अनुशासन लागू कर दिये जाने से ब्राह्मणधर्म का सामंतवाद कितना भयंकर था,यह शरत साहित्य में सिलसिलेवार है और रवींद्र ने इसका दार्शनिक और रचनात्मक तौर पर बौद्ध दर्शन की लोक परंपरा के तहत खूब प्रतिरोध किया है।चंडालिका से लेकर रथेर रशी और राशियार चिठि  से लेकर गीतांजलि तक नास्तिकता का दर्शन बौद्ध परंपरा या चार्वाक चिंतन या फिर वेदांत आधारित जीवन दर्शन है रवींद्र का।

राजा राममोहन राय से लेकर माइकेल मधुसूदन दत्त के मेघनाद वध काव्य में राम को खलनायक रुप में दिखाकर मेघनाद के नायकत्व को बांग्ला राष्ट्रीयता की अस्मिता बन जाने के निरीश्वरवाद और बाद में रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के वेदांत,सर्वेश्वरवाद और ब्राह्मण धर्म  की कुप्रथार्ओं के खिलाफ नवजागरण के सुधार आंदोलन के निरीशवरवाद और नास्तिकता को सिलसिलेवार देखने की जरुरत है।

और यह भी समझने की जरुरत है कि कर्म कांडी ब्राह्मण धर्म के खिलाफ दयानंद सरस्वती का आर्य समाज आंदोलन दर असल बंगाल के नवजागरण का सर्व भारतीय विस्तार है और इन्हीं प्रक्रियाओं के तहत बंगाल और पंजाब में केंद्रित बहुजन समाज का वास्तविक उत्थान है,जिसे हम गायपट्टी  और महाराष्ट्र में ही सीमाबद्ध मान और देख रहे हैं और इसकी सर्व भारतीय विरासत,बंगीय भूमिका को समझने से इंकार कर रहे हैं।

बाकी भारत के लोगों को 19वीं सदी के पुर्तगीज मूल के साहब  एंटनी फिरंगी की कथा शायद ही मालूम हो,जिसने सतीदाह से बचाकर विधवा विवाह करने के बावजूद कंपनी राज में जमींदारियों और ब्राह्मण धर्म के कट्टरपंथ से लड़ने के लिए बंगाल की प्राचीन अनार्य द्रविड़ काली की उपासना को सामंतवाद के खिलाफ अपना अचूक हथियार बना लिया,जो उनके कवि गान की भी लोक जमीन है।एंटनी फिरंगी पर बनी लोकप्रिय फिल्म में एंटनी उत्तम कुमार बने तो उनकी प्रेमिका बनी हिंदी फिल्मों की तनूजा।

हाल में मशहूर बांग्ला फिल्मकार सृजित मुखर्जी ने एंटनी फिरंगी के अंतर्द्वंद्व,उनके प्रेम, उनके आध्यात्म और उनकी रचनाधर्मिता के आधुनिक परिप्रेक्ष्य में पुनर्जन्म की कथा लिखकर एक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म  जातिस्मर बनायी है।

पिछले जन्म की यादों पर केंद्रित सत्यजीत राय की फिल्म सोनार केल्ला के बारे में कमोबेश सबको मालूम है,लेकिन सृजित की इस फिल्म में एंटनी बने प्रसेनजीत और उनकी प्रमेमिका बनी भूतेर भविष्यत् की स्वस्तिका मुखोपाध्याय के मार्फत 19वीं सदी के उस सामंती समाज को आज के मुखातिब कर दिया है।

इस फिल्म में कबीर समुन भी हैं।यह उत्तर आधुनिक बंगाल के आइने में बंगाली राष्ट्रीयता की विकास यात्रा को परदे पर उतारने की बेहतरीन  कोशिश है।

ये दोनों फिल्में अगर आप देख लें तो बंगाल में लोक जीवन और रचनात्मकता के विविध लोकायत आयाम खुल सकते हैं।

मदर टेरेसा के बंगाल में इस तरह सार्वजनीन मां बन जाना और पश्चिमी मीडिया में उनकी सेवा के जरिये कोलकाता के नारकीय बस्ती चित्रों की निरंतरता के बावजूद उनकी मिशनरी गतिविधियों की निर्विकल्प स्वीकृति दरअसल उसी परंपरागत अनार्य द्रविड़ बौद्ध मातृसत्ता का विस्तार है जो मां टेरेसा के कोलकाता की संत बन जाने से अब वैश्विक है।इसके सकारात्मक पक्ष को धर्म सत्ता के संदर्भ से अलग रखकर समझना भी बेहद जरुरी है इस कयामती फिजां के माहौल में।

अंध धर्मोन्मादी हिंदू राष्ट्र के सैन्यीकरण और निरंकुश सत्ता के संदर्भ में मातृसत्ता का यह आवाहन और महोत्सव भारतीयता का असल यथार्थ चेहरा है,जिसकी अखंड भाव भूमि और लोक परंपरा में मां टेरेसा का कोलकाता का संत बनना हुआ है।

सामंतवाद और साम्राज्यवाद के प्रतिरोध में मुक्तबाजारी नरसंहारी तानाशाही की संस्कृति के खिलाफ इसी मातृसत्ता की धर्म निरपेक्षता और प्रगतिशीलता में भारत में अनार्य द्रविड़ इतिहास के रेशम पथ है,जहां से होकर हम फिर मोहनजोदाड़ो और हड़प्पा की सिंधु सभ्यता तक पहुंच सकते हैं।इसी इतिहास को बदला जा रहा है।

गौरतलब है कि भारत विभाजन के तहत सत्ता पर काबिज ब्राह्मणवादी मनुस्मृति धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद ने मोहंजोदाड़ो और हड़प्पा का विभाजन करके हमें इस रेशम पथ से बेदखल कर दिया है।यह दो राष्ट्रों का सिद्धांत नहीं है,सीधे तौर पर ब्राह्मण धर्म का यह पुनरुत्थान है जो एकमुश्त बौद्ध धम्म,जैनधर्म और सिख धर्म की गुरु परंपराओं के साथ साथ नवजागरण और आर्य समाज आंदोलन का निषेध और बजरंगी हिंदुत्व है।

महिष्सुर वध की कथा के इतिहास के मद्देनजर हम नरसंहारी संस्कृति का जितना विरोध करते हैं,उससे अगर मातृसत्ता के जनवाद और लोकतंत्र की भारतीयता को पृथक करने का हम कोई विमर्श शुरु कर सकें तो जैसे हमने लिखा है,बंगाल में कट्टर दुर्गाभक्तों को दुर्गापूजा में महिषासुर वध के मिथक के बहिस्कार से कोई खास ऐतराज नहीं है।

इसी सिलसिले में कहना होगा कि हम हिंदू राष्ट्रवाद में जो धर्मोन्माद देख रहे हैं,उसका भारतीय दर्शन परंपरा से कोई लेना देना नहीं है और न ही भारतीय आध्यात्म और लोक से उसका कोई लेना देना है, और न ही वेद वेदांत से।

यह मिथ्या मिथकों का तिलिस्म अविद्या के मायाजाल का मुक्तबाजारी अमावस्या है।इसके विपरीत भारतीयता संघ परिवार के हिंदुत्व और ब्राह्मणधर्म के मनुस्मृति अनुशासन के विरुद्ध एक ही साथ द्वैत और अद्वैत दोनों है और सर्वेश्वर वाद के वेदांत तक जिसका विस्तार है जो रवींद्र नाथ, नेताजी औस स्वामी विवेकानंद जैसे शूद्र मनीषियो का जीवन दर्शन है और जिसकी भावभूमि ही मां टेरेसा की कोलकाता की संत होने की कथा है।तो 19 वीं सदी के यह एंटनी फिरंगी के कविगान की कथा व्यथा भी है।

भारतीय सांख्य दर्शन अपने प्राचीनत्व के बावजूद बहुत प्रांसगिक है और उसकी वैज्ञानिक दृष्टि हैरतअंगेज है,जो यहां तक कि द्वांद्वात्मक भौतिकवाद और इतिहास की भौतिकवाद की सीमाबद्धता को तोड़ने तक में मददगार साबित हो सकती है।

वैसे भी भारतीय दर्शन चरित्र से अवधारणात्मक होने के बजाय काफी हद तक व्यवहारिक है और जनजीवन में आचरण,व्यवहार ,समाज और राष्ट्र निर्माण में उसकी सक्रिय भूमिका हमेशा रही है।

इसी परंपरा में ही तथागत गौतम का बौद्ध धम्म, जैन धर्म और यहां तक कि सिख धर्म में आचरण और अनुशीलन की सामाजिकता और सत्य,अहिंसा और प्रेम का वैश्विक मानवबंधन है,जिसका नये सिरे से नवजागरण जरुरी है।

लोक जीवन में भारतीय दर्शन की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है,जिस हम आध्यात्म कहकर अक्सर खारिज कर देने की गलती करते हुए बदलाव के मिशन,समता और न्याय की मंजिल हासिल करने,जल जंगल जमीन आजीविका नागरिकता नागरिक और मानवाधिकार, मेहनतकशो की हक हकूक की लडाई में अपने इतिहास और विरासत की जमीन पर खड़े होने से सीधे इंकार कर देते हैं।यह आत्मघाती अविद्या है।

गौरतलब है कि बाबासाहेब ने मनुस्मृति बंदोबस्त को मजबूत बनाने वाले महाकाव्यों और पुराणों के मिथकों का खंडन किया है और इन्हें छोड़ भारतीय दर्शन परंपरा की मनुस्मृति जैसी आलोचना नहीं की है और दहन उन्होंने सिर्फ मनुस्मृति का किया है।

गौरतलब है कि वैदिकी साहित्य को पढ़ने या शिक्षा के अधिकार से वंचित होने के बावजूद हमारे लोक जीवन में भारतीय दर्शन के मुताबिक आम जनता के व्यवहार,आचरण और सामाजिकता में कोई व्यवधान नहीं है।शाश्वत निरंतरता है और भारत का वजूद यही है।

जैसे ब्राह्मणों के द्विज बनने के लिए दीक्षा जरुरी है,शूद्रों और अछूतों में,आदिवासियों में भी दीक्षित होने की परंपरा है और इस मामले में गुरुओं की निश्चित भूमिका रही है।

भारतीय संत परंपरा ने भारतीय सामाजिक जीवन में इसी दर्शन पंरपरा की व्यावहारिकता के आध्यात्म के नाम संप्रेषित किया है।

संत बाउल पीर फकीर का साझा चूल्हा इसीतरह भारत को भारत तीर्थ बनाता रहा है।

दो दिन पहले भुवनेश्वर से अभिराम मलिक ने दार्शनिक रजनीश ओशो का गुजरात के आरक्षणविरोधी आंदोलन के संदर्भ में हिंदू राष्ट्रवाद के दुराग्रह के खिलाफ समता और न्याय के पक्ष में प्रवचन का वीडियो शेयर किया है।अद्भुत दार्शनिक रजनीश ने भी हजारों साल से शूद्रों और अछूतों की शिक्षा के अधिकार से वंचित करने की ब्राह्मणधर्म के मनुस्मृति अनुशासन को समता और न्याय के रास्ते में सबसे बड़ा अवरोध बताया है।

सांख्य दर्शन के मुताबिक पुरुष और प्रकृति को सृष्टि का दो मूल तत्व बताया गया है।पुरुष ही सांख्य दर्शन के मुताबिकआत्मा हैजो देह,मन,इंद्रिय,बुद्धि या जड जगत का कोई वस्तु नहीं है।पुरुष की अभिव्यक्ति चेतना है।जबकि जड़ जगत की भौतिकता प्रकृति है।यही द्वंद्वात्म भौतिकवाद की नींव है।

अविद्या के अहंकार का महातिलिस्म धर्मोन्मादी राष्ट्र पुरुष और प्रकृति के संजोग से ही सृष्टि की सिंथेसिस  है।

पुरुष और प्रकृति को लेकर सांख्य कुल पच्चीस हैं।

यह सांख्य दर्शन गौर करें, निरीश्वर वादी है और इसमें चार्वाक दर्शन परंपरा की निरंतरता है।पुरुष और प्रकृति का अविवेक अर्थात अभेद ज्ञान ही पुरुष यानी चेतना का बंधन है।

सांखय दर्शन के मुताबिक यही अविवेक, चेतनाहीनता ही बंधन और दुःख का कारण है। भारतीय दर्शन में आम तौर पर इसे फिर माया का बंदन कहा गया है।

सांख्यदर्शन के मुताबिक दुःख निवारणके लिए विवेकज्ञान और प्रकृति और पुरुष का भेद ज्ञान अनिवार्य है।विवेक ज्ञान से ही दुःखों से निवृत्ति का मार्ग है।

गौरतलब है कि भारतीय दर्शन और संत परंपरा धर्म निरपेक्ष प्रगतिशील विवेक या चेतना की वैज्ञानिक दृष्टि और प्रज्ञा का निरंतर अनुसंधान और अनुशीलन है,साधना परंपरा है और जनजागरण अभियान भी है,जिसे हम आध्यात्म कहते हैं।

इसी प्रस्थाबिंदू पर फिर  सर्वेश्वरवाद और वेदांत दर्शन है जो हमें नर में नारायण देखने की सम्यक दृष्टि से समृद्ध करती है और रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद के इस वेदांत और सर्वेशवर वाद में फिर अनार्य द्रविड़ मातृसत्ता का आवाहन है।

चेतना के लिए नव जागरण में ही भारत में नास्तिकता के आधार पर जैन और बौद्ध धर्म है तो समूची चार्वाक चिंतन परंपरा है और बौद्ध दर्शन के मुताबिक भी दुःख और अविद्या तक बारह निदान हैं।

बौद्ध दर्शन के मुताबिक भी दुःख की मूल वजह अविद्या है।

चार्वाक दर्शन में फिर भौतिकवादी व्याख्या के तहत ईश्वर से लेकर पुनर्जन्म, कर्मफल, लोक परलोक,स्वर्ग नर्क और कर्मकांड के ब्राह्मण धर्म का खंडन है जो अंध राष्ट्रवाद और उसके मिथक औक कुसंस्कारों पर आधारित मिथकीय वैदिकी और बाद में बुद्धमय भारत के अवसान के बाद मनुस्मृति अनुशासन के प्रतिरोध में अखंड जनजागरण है।

इसी तरह जैन धर्म में भी जीव को चेतना की अभिव्यक्ति के रुप में देखा गया है।

इन तमाम बिंदुओं पर सिलसिलेवार विमर्श जरुरी है।

इस अनिवार्य विमर्श में फिर बाधा ज्ञानविरुद्ध अविद्या का धर्मोन्मादी अंध राष्ट्रवाद है।दरअसल अविद्या के अहंकार का महातिलिस्म ही अंध धर्मोन्मादी राष्ट्र है और यही माया और मिथ्या का अखंड वर्चस्ववादी मुक्ताबाजारी आक्रामक विध्वंसक रंगभेद है।जो असल में फासिस्ट वैश्विक रंगभेदी नरसंहार संस्कृति है और हम उसके उपनिवेश हैं।

इसी संदर्भ में हड़प्पा और मोहनोजोदाडो़ के रेशम पथ का नया आविष्कार जितना अनिवार्य है,उससे भी ज्यादा अनिवार्य है कि पितृसत्ता के इस ब्रह्मण धर्म के प्रतिरोध में मातृसत्ता का नवजागरण हो और इसी सिलसिले में महिषासुर विमर्श पर मातृसत्ता की धर्मनिरिपेक्षता के संदर्भ में नये सिरे से संवाद अनिवार्य है।
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