Thursday, June 2, 2016

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख सुना नरभक्षी? जालिम हर हाल में सीखचों के पीछे होना चाहिए, चाहे अफ्रीका हो या भारत हस्तक्षेप के संचालन में छोटी राशि से सहयोग दें आखिर हम इन सब को ना मारते तो हमारा राष्ट्र, संस्कृति और धर्म कैसे बचता ? Posted:Thu, 02 Jun 2016 19:00:57 +0000 हिमांशु कुमार कुछ लोग मारे गए क्योंकि उनकी दाढ़ियाँ लंबी थीं. और दूसरे कुछ इसलिए मारे गए क्योंकि उनकी खाल The post आखिर हम इन सब को ना मारते तो हमारा... पूरा आलेख पढें एवं अपनी प्रतिक्रिया भी दें http://hastakshep.com/ सुना नरभक्षी? जालिम हर हाल में सीखचों के पीछे होना चाहिए, चाहे अफ्रीका हो या भारत Posted:Thu, 02 Jun 2016 18:28:46 +0000 शमशाद इलाही शम्स इसका नाम है हिसैन हब्रे, उम्र 72 साल. 1982 में सी आई ए और फ़्रांस के समर्थन से मध्यअफ्रीकी The post सुना नरभक्षी? जालिम हर हाल में... पूरा आलेख पढें एवं अपनी प्रतिक्रिया भी दें http://hastakshep.com/ कांग्रेसी मूर्खता की विराटता बनाम बीजेपी भक्ति वैभव Posted:Thu, 02 Jun 2016 18:09:34 +0000 शैलेन्द्र कुमार शुक्ल हम पिछले कई दशकों से मूर्खता की विराटता से मुक्ति पाने के लिए लड़


महत्वपूर्ण खबरें और आलेख सुना नरभक्षी? जालिम हर हाल में सीखचों के पीछे होना चाहिए, चाहे अफ्रीका हो या भारत


हस्तक्षेप के संचालन में छोटी राशि से सहयोग दें


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France figts against Labour Reform Bill.ফ্রান্সে লড়াই চলছে, নতুন আনা 'লেবার রিফর্ম বিল' এর বিরোধিতা করে.Suswagata Poria explains it in Bengali


Suswagata Poria

ফ্রান্সে লড়াই চলছে, নতুন আনা 'লেবার রিফর্ম বিল' এর বিরোধিতা করে। নতুন বিল ব্যাপক ভাবে অস্থায়ী শ্রমিক নিয়োগের কথা বলা হয়েছে এবং কোম্পানী মালিকদের বহু অনৈতিক সুবিধে দেওয়ার কথা বলা হয়েছে। সারা দেশ জুড়ে এক মাসেরও বেশি সময় ধরে শ্রমিকদের সাথে যুবক যুবতীরা রাস্তা দখল করেছে। দফায় দফায় লড়াই চলছে পুলিশ ও সামরিক বাহিনীর সাথে। মিডিয়া কভার করছে না। কভার করলেও বলছে 'দাঙ্গা' বা 'রায়ট'। ব্যাপক পরিবহণ ধর্মঘট হচ্ছে সারা দেশ জুড়েই।

বেলজিয়ামে পাবলিক সেক্টরের শ্রমিকরা ব্যাপক ধর্মঘট করছে সারা দেশ জুড়ে। মূল লক্ষ্য সরকারের পাবলিক সেক্টরে খরচ কমিয়ে বেসরকারি কোম্পানির হাতে লাগাম তুলে দেওয়া।

দিল্লীর ওয়াজিরপুরে এক 'পাওয়ার ব্যাঙ্ক' তৈরির কারখানায় মালিক ৪১ জন শ্রমিক কে কাজ থেকে বহিষ্কার করে কারণ তারা নূন্যতম মজুরির দাবী করেছিল। ১০ দিন ধরে কারখানার গেটে লড়াই চালানোর পর আজ মালিক নুন্যতম মজুরি দিতে রাজি হয়েছে। এর সাথে কতক্ষণ কাজ করতে হবে, সেই ব্যাপারেও একটা নিয়ন্ত্রণ আনার কথা ভাবতে বাধ্য হয়েছে।

খবর গুলোর লিঙ্ক পরপর দিলাম। এই লড়াইগুলোই এই সময়ে খানিক আশার কথা।

http://anonhq.com/violent-protests-labor-strikes-halt-fran…/

https://www.facebook.com/telesurenglish/videos/850115925131811/

https://www.facebook.com/nayandrome/posts/1445234465502807


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भारत बेशक बदल रहा है , सर'जी. दिल्ली से हैदराबाद और बनारस से मुम्बई तक दलित वंचित जन उसे बदल रहे हैं. भारत की नई स्त्री उसे बदल रही है . ये अलीगढ़ की लड़कियां है . इतिहास में पहली बार बहत्तर घंटे. रात दिन. खुले में धरना देकर उन्होंने अमुवि प्रशासन से छुट्टियों में हॉस्टल खाली कराने का फैसला वापिस करा लिया है . छात्रों के लिए अभी तक फैसला नहीं हुआ . संघर्ष जारी है . बजरिए-मुबीन खान

भारत बेशक बदल रहा है , सर'जी. दिल्ली से हैदराबाद और बनारस से मुम्बई तक दलित वंचित जन उसे बदल रहे हैं. भारत की नई स्त्री उसे बदल रही है . 
ये अलीगढ़ की लड़कियां है . इतिहास में पहली बार बहत्तर घंटे. रात दिन. खुले में धरना देकर उन्होंने अमुवि प्रशासन से छुट्टियों में हॉस्टल खाली कराने का फैसला वापिस करा लिया है . छात्रों के लिए अभी तक फैसला नहीं हुआ . संघर्ष जारी है .
बजरिए-मुबीन खान



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Himanshu Kumar कुछ लोग मारे गए क्योंकि उनकी दाढ़ियाँ लंबी थीं . और दूसरे कुछ इसलिए मारे गए क्योंकि उनकी खाल का रंग हमारी खाल के रंग से ज़रा ज़्यादा काला था . कुछ लोगों की हत्या की वाजिब वजह यह थी कि वो एक ऐसी किताब पढते थे जिसके कुछ पन्नों में हमारी किताब के कुछ पन्नों से अलग बातें लिखी हुई थीं . कुछ लोग इसलिए मारे गए क्योंकि वो हमारी भाषा नहीं बोलते थे . कुछ को इसलिए मरना पड़ा क्योंकि वो हमारे देश में नहीं पैदा हुए थे . कुछ लोगों की हत्या की वजह ये थी कि उनके कुर्ते लंबे थे . कुछ को अपने पजामे ऊंचे होने के कारण मरना पड़ा . कुछ के प्रार्थना का तरीका हमारे प्रार्थना के तरीके से अलग था इसलिए उन्हें भी मार डाला गया . कुछ दूसरों की कल्पना ईश्वर के बारे में हमसे बिलकुल अलग थी इसलिए उन्हें भी जिंदा नहीं रहने दिया गया . लेकिन हमारे द्वारा करी गयी सारी हत्याएं दुनिया की भलाई के लिए थीं . हमारे पास सभी हत्याओं के वाजिब कारण हैं . आखिर हम इन सब को ना मारते तो हमारा राष्ट्र, संस्कृति और धर्म कैसे बचता ?

Himanshu Kumar

कुछ लोग मारे गए क्योंकि उनकी दाढ़ियाँ लंबी थीं .

और दूसरे कुछ इसलिए मारे गए क्योंकि उनकी खाल का रंग हमारी खाल के रंग से ज़रा ज़्यादा काला था .

कुछ लोगों की हत्या की वाजिब वजह यह थी कि वो एक ऐसी किताब पढते थे जिसके कुछ पन्नों में हमारी किताब के कुछ पन्नों से अलग बातें लिखी हुई थीं .

कुछ लोग इसलिए मारे गए क्योंकि वो हमारी भाषा नहीं बोलते थे .

कुछ को इसलिए मरना पड़ा क्योंकि वो हमारे देश में नहीं पैदा हुए थे .

कुछ लोगों की हत्या की वजह ये थी कि उनके कुर्ते लंबे थे .

कुछ को अपने पजामे ऊंचे होने के कारण मरना पड़ा .

कुछ के प्रार्थना का तरीका हमारे प्रार्थना के तरीके से अलग था इसलिए उन्हें भी मार डाला गया .

कुछ दूसरों की कल्पना ईश्वर के बारे में हमसे बिलकुल अलग थी इसलिए उन्हें भी जिंदा नहीं रहने दिया गया .

लेकिन हमारे द्वारा करी गयी सारी हत्याएं दुनिया की भलाई के लिए थीं .

हमारे पास सभी हत्याओं के वाजिब कारण हैं .

आखिर हम इन सब को ना मारते तो हमारा राष्ट्र, संस्कृति और धर्म कैसे बचता ?


ध्यान से देखिये इस इंसान को ၊

इस नें ही सोनी सोरी के चेहरे पर एसिड अटैक करवाया था ၊

यह छत्तीसगढ़ के मारडूम थाने का थानेदार प्रकाश शुक्ला है ၊

इसने थाने में ही सोनी पर हमले की योजना बनाई थी ၊

मोदी सरकार के सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल नें छत्तीसगढ़ सरकार के साथ मिलकर सन २०१६ में ज़मीनों पर पूरा कब्ज़ा करने का लक्ष्य तय किया है ၊

उसके बाद ही बीच में आने वाले पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं , वकीलों, आदिवासी नेताओं पर हमले तेज़ किये गये हैं

और आदिवासी महिलाओं के साथ पुलिस ने बार बार सामूहिक बलात्कार किये हैं ၊

उसी कड़ी में सोनी सोरी पर पुलिस नें हमला किया था .

मैं चुनौती देता हूँ ၊ या तो सरकार इस थानेदार को गिरफ्तार करे

या इस पर इल्ज़ाम लगाने के लिये मुझे गिरफ्तार करे ၊

Himanshu Kumar's photo.


आप के बच्चों के अच्छे नम्बर आये होंगे

आप बहुत खुश भी होंगे

आप अपने बच्चों को प्रेरित कर रहे होंगे कि वो बहुत बड़े आदमी बनें

आप अपने बच्चों से कहते होंगे देखो टाटा अम्बानी और अदाणी जिंदल

अपनी मेहनत से कितने बड़े आदमी बन गए हैं

आप अपने बच्चों को भी प्रेरित करते होंगे कि वे भी मेहनत करें ताकि

इन अमीरों की तरह सफल इंसान बनें और दुनिया में अपना नाम कमाएँ

लेकिन क्या सच में ये अमीर अपनी मेहनत से अमीर बने हैं ?

ध्यान दीजिए

अमीर बनने के लिए दो चीज़ें चाहियें

प्राकृतिक संसाधन और मेहनत

जितने भी सेठ हैं उन्होंने देश के संसाधनों पर कब्ज़ा किया

और मजदूर की मेहनत के दम पर अमीर बन गए

इसलिए जब कोई अमीर कहे कि वह मेहनत से अमीर बना है

तो उससे पूछियेगा किसकी मेहनत से ?

अमीर के लिए मेहनत करने वाला मजदूर जब अपनी मेहनत का पूरा मोल मांगता है

तब क्या होता है ?

तब सरकार की पुलिस जाकर अमीर की तरफ से गरीब मजदूरों को लाठी से पीटती है

और मजदूर ज़्यादा ताकत दिखाएँ तो गोली से उड़ा देती है

अगर मजदूर को उसकी मेहनत का पूरा पैसा दे दिया जाय तो कोई भी इंसान सेठ नहीं बन पायेगा

दूसरी वस्तु जो अमीरी के लिए चाहिये वह है प्राकृतिक संसाधन

प्राकृतिक संसाधनों का मालिक कौन है ?

संविधान के मुताबिक़ देश की जनता

जनता के संसाधन क्या किसी एक व्यक्ति के हवाले किये जा सकते हैं ?

क्या हजारों किसानों की ज़मीन छीन कर किसी एक उद्योगपती को सौंपी जा सकती है ?

नहीं सौंपी जा सकती है

भारत के संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांत कहते हैं

कि राज्य का कर्तव्य होगा कि वह नागरिकों के बीच समानता लाने की दिशा में काम करेगा

लेकिन अगर सरकार एक उद्योगपति के लिए हजारों लोगों की ज़मीन छीन कर उन्हें गरीब बनाती है

तो सरकार यह काम संविधान के खिलाफ़ करती है

यानि उद्योगपति संविधान के खिलाफ़ काम करके अमीर बनते हैं

इसलिए अगर आप अपने बच्चों को इन उद्योगपतियों की तरह अमीर बनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं

तो आप अपने बच्चों को संविधान के खिलाफ़ जाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं

खैर आप को संविधान से क्या लेना देना ?

आप तो यह सब मानते ही नहीं

संविधान तो यह भी कहता है कि भारत का हर नागरिक बराबर होगा

इसका मतलब है कि टाटा और बस्तर का किसान बराबर है

और टाटा के लिए बस्तर के किसान की ज़मीन नहीं छीनी जा सकती

लेकिन आप संविधान को कहाँ मानते हैं ?

वैसे जब सरकार नक्सलवादियों की हत्या करती हैं तो आप कहते हैं कि

इन्हें इसलिए मार गया है क्योंकि यह संविधान को नहीं मानते

हम आपसे पूछते हैं कि क्या आप और आपकी सरकार संविधान को मानते हैं

नहीं आप संविधान को बिलकुल भी नहीं मानते

अगर संविधान सच में लागू हो जाय तो कोई भी इंसान सेठ नहीं बन सकता

आइये अब आपको बताते हैं टाटा सेठ के कारनामें

बस्तर में लोहंडीगुडा नामके गाँव में टाटा सेठ को एक लोहे का कारखाना लगाना है

किसान उस ज़मीन पर पीढ़ियों से खेती करते हैं

आदिवासियों नें अपनी ज़मीन छीनने का विरोध किया

कानून कहता है कि किसानों की ज़मीन लेने से पहले सरकार जन सुनवाई करेगी

जन सुनवाई गाँव में ही होनी चाहिये

लेकिन लोहंडीगुडा में टाटा का कारखाना लगाने के लिए जन सुनवाई गाँव से

चालीस किलोमीटर दूर कलेक्टर आफिस में रखी गयी

गाँव वाले जन सुनवाई में ना आ सकें इसके लिए गाँव को चारों तरफ से पुलिस नें घेर कर रखा

बारहवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक लड़की नें अपने घर के बाहर खड़ी पुलिस का विरोध किया

तो सुरक्षा बलों के जवानों नें उस लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया

सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया नें इस घटना के खिलाफ़ राष्ट्रीय महिला आयोग को शिकायत भेजी

लेकिन महिला आयोग नें कोई कार्यवाही नहीं करी

अभी हाल में ही गाँव वालों नें फिर से अपनी ज़मीनें छीनने के विरोध में एक सभा करी

इस सभा में आदिवासी महासभा के अध्यक्ष मनीष कुंजाम को बुलाया गया

पुलिस नें घबरा कर बदमाशी करी

पुलिस नें एक गाँव में जाकर आदिवासियों को धमकाया और उन्हें ज़बरदस्ती लेकर आए

इन गाँव वालों के हाथों में तख्तियां पकड़ा दी गयीं जिन पर लिखा गया था कि मनीष कुंजाम वापिस जाओ

नक्सलवादी मुर्दाबाद

यानी जो टाटा का विरोध करेगा वह नक्सलवादी है

यानी जो किसानों की ज़मीनें बचाने की कोशिश करेगा

वह भी नक्सलवादी है

यानी जो संविधान का साथ देगा वह नक्सलवादी है

जो टाटा के लिए संविधान तोड़ेगा वह देशभक्त है

पत्रकारों नें इन विरोध करने वाले लोगों से पूछ कि आप यहाँ क्यों आये हैं ?

तो उन्होंने कहा कि हमें साहब लेकर आये हैं

लेकर आने वाले साहब , यानी थानेदार साहब भी भीड़ में सादी वर्दी में छिपे हुए थे

क्या बुरे दिन आ गए हैं कि थानेदार टाटा की नौकरी कर रहा है

और तनख्वाह जनता के टैक्स से ले रहा है

यह वही थानेदार है जिसने सोनी सोरी के मुंह पर तेज़ाब फिंकवाया है

इसी थानेदार के मारडूम थाने में पुलिस वालों नें

सोनी के मुंह पर तेज़ाब फेंकने की योजना बनाई थी

अब आपको कुछ समझ में आ रहा है

कि यह सब खेल कितना गन्दा और हिंसक है

यह नक्सलवाद से लड़ने के नाम पर सरकार असल में क्या गंदे खेल खेल रही है ?

आपको समझ में आया कि टाटा अम्बानी अदाणी जिंदल बनने के लिए

कितनी हत्याएं कितने बलात्कार और कितना भ्रष्टाचार करना पड़ता है

क्या आप अब भी अपने बच्चों को अमीर बनने के लिए प्रेरित करेंगे ?

Himanshu Kumar's photo.

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Wednesday, June 1, 2016

ग्राउंड दलित रिपोर्ट- 2 (धाकड़खेडी) जहाँ दलित अब भी सामाजिक बहिष्कार झेल रहे है .

ग्राउंड दलित रिपोर्ट- 2

(धाकड़खेडी) 
जहाँ दलित अब भी सामाजिक बहिष्कार झेल रहे है .
....................

भीलवाडा जिले के मांडलगढ़ तहसील में एक गाँव है धाकड़खेडी , जो लगभग 250 परिवारों का गाँव है, जहाँ 150 के लगभग धाकड़ जाति के परिवार है जबकि 30 से 35 परिवार दलित समुदाय के है! दलित परिवारों में से अधिकतर इन्ही धाकड़ जाति के खेतों में मजदूरी करते है!कुछ दलित परिवार ऐसे है जो स्वयं का रोजगार कर जीवनयापन करते है शायद यही बात इन धाकड़ जाति के लोगो और अन्य गैर दलितों से बर्दास्त नहीं हुयी और इसी बात को लेकर गैर दलितों द्वारा इन दलित परिवारों को सबक सिखाने का मौका तलाश किया जा रहा था और वो मौका उन्हें मिल गया! 
मौका था एक सरकारी शिक्षक मांगी लाल धाकड़ के द्वारा अपनी माताजी के गंगोज (म्रत्युभोज) कार्यक्रम का! भोजन गाँव के ही एक सार्वजानिक मार्ग पर आयोजित किया जा रहा था क्यों की सार्वजानिक मार्ग था तो लोग उसी रास्ते से अपने घरों को जा रहे थे, उसी वक़्त दलित समुदाय के दिनेश रेगर भी उन्ही लोगों के पीछे अपनी मोटरसाईकिल से उसी मार्ग से निकल गए बस यही बात धाकड़ लोगो को नागवार गुजरी और दुसरे ही दिन मांगी लाल धाकड़,छीतर धाकड़,कैलाशचंद्र,प्यारचंद धाकड़ आदि लोगों ने जाति पंचायत बुलाकर दिनेश रेगर को भी बुलावा भेजा ! जाति पंचायत में दिनेश रेगर और उनके बड़े भाई लादू रेगर शामिल हुए !उनके आते ही लोग उन पर चिल्लाने लगे और कहा की तुम्हे गाँव में रहते हुए इतने साल हुए लेकिन अभी तक हमारे साथ कैसे रहा जाये उसका सलीका तुम्हे नहीं आया! एक तरफ जाति पंचायत में 200 लोग थे तो दूसरी तरफ सिर्फ दिनेश व् लादू रेगर! लोगों की भीड़ को देखकर लादू रेगर ने अपने भाई की तरफ से बिना गलती के भी माफ़ी मांगी लेकिन लोगों ने कहा की माफ़ी से काम नहीं चलेगा तो लादू रेगर ने कहा की तो कोई जुरमाना ले लो और हमें माफ़ करो! इस पर जाति पंचायत के सब लोग उन दोनों पर चिल्लाने लगे और कहा की हमारे दिन इतने ख़राब आ गए की हम तुम रेगरों से पैसा लेंगे और सबने उनको फरमान सुना दिया की आज से इनके परिवार को कोई दुकानों से किराने का सामान नहीं देगा और ना ही होटल से चाय पीने देगा और इसके साथ गाँव वालों को भी कह दिया कि जो भी इनको सामान देगा उनको जुर्माना देना होगा ! इस तरह लादू रेगर सहित चार दलित रेगर परिवारों को सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर दिया गया ! इस घटना के बाद लादू रेगर ने थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई! मामले को अनुसूचित जाति जनजाति एक्ट की धाराओं में दर्ज किया गया ,और जाँच पुलिस उपाधीक्षक जीवन सिंह को दी गयी लेकिन 1 महीने में ही मामले को फर्जी बताकर FR(फाइनल रिपोर्ट) लगा दी गयी! पुलिस उपाधीक्षक जीवन सिंह द्वारा जाँच में लीपापोती करने को लेकर जिला पुलिस अधीक्षक को भी शिकायत की गयी लेकिन कोई सुनवाई नहीं की गयी !आगे FR को लेकर विरोध पत्र भी कोर्ट में पेश किया गया लेकिन अभी तक सिर्फ नयी तारीखे ही सुनवाई के लिए मिल रही है! मामले को अनुसूचित जाति आयोग से लेकर मानवाधिकार आयोग तक भी ले जाया गया तथा दोनों ही आयोग द्वारा जिला पुलिस अधीक्षक से मामले में जवाब माँगा गया लेकिन जवाब भेजने में भी पुलिस वाले लीपापोती करने की कोशिश कर रहे है और आये दिन लादू रेगर व् उनके भाई को डरा धमका कर मामले को फर्जी साबित करवाने के लिए जबरन हस्ताक्षर लेना चाह रहे है ! तब से लेकर अभी तक 9 महीने से लादू रेगर का परिवार गाँव से सामाजिक रूप से बहिष्कृत है, किराने के सामान से लेकर बच्चों के लिए दूध तक 3 किलोमीटर दूर सिंगोली से लाना पड़ रहा है!यहाँ तक की पीड़ित परिवार के खेतों को जोतने के लिए जो ट्रेक्टर पहुंचे उनको भी धाकड़ समाज के लोगों ने खेत जोतने से मना कर दिया और कहा की अगर इनके खेत जोते तो जुर्माना भरना पड़ेगा! गाँव के अन्य दलित परिवार भी दबंग धाकड़ों व् जुर्माने के डर से अपने किसी भी कार्यक्रम में लादू रेगर के परिवार को नहीं बुला रहे है! इसके अलावा उन दलित परिवारों को गाँव की सार्वजनिक हथाई पर बैठने का अधिकार नहीं,मंदिर में जाने का अधिकार नहीं और ना ही बिन्दोली निकालने का अधिकार है !
एक तरफ तो जहाँ सरकार संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर जी की 125वी जयंती पर हजारों कार्यक्रम आयोजित कर रही है और समानता के हजार दावे कर रही है वही दूसरी तरफ उसी सरकार के बड़े पदों पर बैठे लोग बाबा साहब के बनाये कानून की धज्जियाँ उड़ा रहे है और दलित समुदाय के रेगर परिवार के व्यक्ति अपने ही गाँव के सार्वजनिक मार्ग पर भी अपनी मर्जी से नहीं निकल पा रहे है!
- राकेश शर्मा
(लेखक दलित,आदिवासी व घुमन्तु समुदाय के लिए बने स्टेट रेस्पोंस ग्रुप के साथ कार्यरत है)

Bhanwar Meghwanshi's photo.

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